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अबकी सामने वाले की थाली खींचने की तैयारी में हैं अखिलेश
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बरेली। सपा-बसपा गठबंधन से भगवत सरन गंगवार की एंट्री ने बरेली सीट का गणित काफी हद तक बदल दिया है। माना जा रहा है कि भगवत के आने के बाद बरेली सीट पर मुकाबला दिलचस्प होगा और अब इस सीट पर कोई आसानी से कब्जा नहीं कर पाएगा। भाजपा के खेमे में जातिगत वोटों के बंटवारे की आशंका साफ दिख रही है और नए समीकरणों पर मंथन भी शुरू हो गया है। अमर उजाला पहले ही यह संभावना जता चुका है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह यादव की तरह इस बार बरेली सीट पर भाजपा के आगे सजी-सजाई थाली पेश नहीं करेंगे। गठबंधन के प्रत्याशी की घोषणा के साथ यह साफ भी हो गया है कि इस बार चुनाव में यहां कड़ा त्रिकोणीय मुकाबला होगा।
याद दिला दें कि 2009 के चुनाव में जब भाजपा प्रत्याशी संतोष गंगवार हारे थे और कांग्रेस प्रत्याशी प्रवीण सिंह ऐरन ने चुनाव जीता था, तब भी चुनाव मैदान में इन्हीं तीनों महारथियों के बीच संघर्ष हुआ था। फर्क बस इतना है कि उस चुनाव में बसपा का प्रत्याशी अलग था और इस बार भगवत सरन गंगवार सपा-बसपा के संयुक्त प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे हैं। हालांकि उन्हें प्रत्याशी घोषित करने से पहले सपा हाईकमान ने लंबा इंतजार कराया। वजह यह थी कि भगवत सरन के अलावा पूर्व विधायक और सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अताउर्रहमान, पूर्व विधायक सुल्तान बेग और पूर्व विधायक इस्लाम साबिर ने भी सपा के टिकट पर दावा ठोक रखा था। इसके अलावा मुंबई के एक बड़े कारोबारी की भी पैरवी पार्टी के कई नेता कर रहे थे। इसके चलते राजनीतिक हल्कों में यह भी सवाल उठ रहा था कि समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह यादव की तरह बरेली की सीट पर मुस्लिम प्रत्याशी को उतारकर भाजपा की जीत एक बार फिर आसान करेगी या फिर कोई सशक्त हिंदू प्रत्याशी उतारकर गंभीरता से चुनाव मैदान में उतरेगी। अमर उजाला ने हिंदू प्रत्याशी उतारे जाने की संभावना जताई थी और आखिरकार वैसा ही हुआ।
दरअसल, भगवत सरन ने पार्टी हाईकमान से बरेली या पीलीभीत सीट के लिए टिकट मांगा था। सपा का एक खेमा भगवत का विरोध करने में जुटा हुआ था और दूसरा खेमा अल्पसंख्यक समुदाय के प्रत्याशी को चुनाव लड़ाना चाहता था। इसी के चलते मुंबई के कारोबारी का नाम मजबूती से हाईकमान के सामने रखा गया था। मगर अखिलेश यादव ने उसे जिताऊ उम्मीदवार नहीं माना। अब सपा-बसपा गठबंधन से भगवत सरन गंगवार के प्रत्याशी बनने के बाद कुछ जातियों, खासतौर से कुर्मी वोटों के बंटवारे की आशंका ने भाजपा की चिंता बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि भाजपा को नए सिरे से अपनी रणनीति बनाने को मजबूर होना पड़ेगा। उधर, कांग्रेस भी पूरे दमखम से भाजपा को चुनौती दे रही है। भाजपा को अब दोहरी चुनौती से पार पाना होगा।
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आजम खां के वीटो से बनी भगवत की बात
समाजवादी पार्टी के सूत्रों की मानें तो पार्टी के कद्दावर नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री आजम खां ने भगवत सरन गंगवार की पैरवी करते हुए बरेली में प्रत्याशी तय करने के मामले में अखिलेश यादव के सामने अपना वीटो लगा दिया था। इस मामले में दोहरा दबाव पड़ने से पार्टी हाईकमान काफी समय से असमंजस में था, लेकिन अंतत: अल्पसंख्यक वर्ग का प्रत्याशी खड़ा करने की रणनीति पर हाईकमान को रास नहीं आई और भगवत सरन को ही सबसे मजबूत प्रत्याशी माना गया। लेकिन पार्टी हाईकमान की पसोपेश के चलते टिकट घोषित करने में अच्छी-खासी देर लग गई।
2009 में भगवत ने बदल दिया था चुनावी गणित
पूर्व मंत्री भगवतसरन गंगवार वर्ष 2009 में भी सपा से लोकसभा प्रत्याशी बने थे। उनको उस चुनाव में भले ही वोट कम मिले थे और चुनाव में पराजित हो गए थे, लेकिन उस चुनाव में उन्होंने भाजपा का खेल बिगाड़ते हुए पूरा चुनावी गणित बदल दिया था। भाजपा की जीती हुई सीट उस समय कांग्रेस ने कड़े मुकाबले में उससे छीन ली थी। भगवत के दोबारा लोकसभा प्रत्याशी बनने के बाद भाजपा को अपने परंपरागत और सजातीय मतदाताओं के अपने पाले में रखने की चुनौती होगी।
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याद दिला दें कि 2009 के चुनाव में जब भाजपा प्रत्याशी संतोष गंगवार हारे थे और कांग्रेस प्रत्याशी प्रवीण सिंह ऐरन ने चुनाव जीता था, तब भी चुनाव मैदान में इन्हीं तीनों महारथियों के बीच संघर्ष हुआ था। फर्क बस इतना है कि उस चुनाव में बसपा का प्रत्याशी अलग था और इस बार भगवत सरन गंगवार सपा-बसपा के संयुक्त प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे हैं। हालांकि उन्हें प्रत्याशी घोषित करने से पहले सपा हाईकमान ने लंबा इंतजार कराया। वजह यह थी कि भगवत सरन के अलावा पूर्व विधायक और सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अताउर्रहमान, पूर्व विधायक सुल्तान बेग और पूर्व विधायक इस्लाम साबिर ने भी सपा के टिकट पर दावा ठोक रखा था। इसके अलावा मुंबई के एक बड़े कारोबारी की भी पैरवी पार्टी के कई नेता कर रहे थे। इसके चलते राजनीतिक हल्कों में यह भी सवाल उठ रहा था कि समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह यादव की तरह बरेली की सीट पर मुस्लिम प्रत्याशी को उतारकर भाजपा की जीत एक बार फिर आसान करेगी या फिर कोई सशक्त हिंदू प्रत्याशी उतारकर गंभीरता से चुनाव मैदान में उतरेगी। अमर उजाला ने हिंदू प्रत्याशी उतारे जाने की संभावना जताई थी और आखिरकार वैसा ही हुआ।
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दरअसल, भगवत सरन ने पार्टी हाईकमान से बरेली या पीलीभीत सीट के लिए टिकट मांगा था। सपा का एक खेमा भगवत का विरोध करने में जुटा हुआ था और दूसरा खेमा अल्पसंख्यक समुदाय के प्रत्याशी को चुनाव लड़ाना चाहता था। इसी के चलते मुंबई के कारोबारी का नाम मजबूती से हाईकमान के सामने रखा गया था। मगर अखिलेश यादव ने उसे जिताऊ उम्मीदवार नहीं माना। अब सपा-बसपा गठबंधन से भगवत सरन गंगवार के प्रत्याशी बनने के बाद कुछ जातियों, खासतौर से कुर्मी वोटों के बंटवारे की आशंका ने भाजपा की चिंता बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि भाजपा को नए सिरे से अपनी रणनीति बनाने को मजबूर होना पड़ेगा। उधर, कांग्रेस भी पूरे दमखम से भाजपा को चुनौती दे रही है। भाजपा को अब दोहरी चुनौती से पार पाना होगा।
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आजम खां के वीटो से बनी भगवत की बात
समाजवादी पार्टी के सूत्रों की मानें तो पार्टी के कद्दावर नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री आजम खां ने भगवत सरन गंगवार की पैरवी करते हुए बरेली में प्रत्याशी तय करने के मामले में अखिलेश यादव के सामने अपना वीटो लगा दिया था। इस मामले में दोहरा दबाव पड़ने से पार्टी हाईकमान काफी समय से असमंजस में था, लेकिन अंतत: अल्पसंख्यक वर्ग का प्रत्याशी खड़ा करने की रणनीति पर हाईकमान को रास नहीं आई और भगवत सरन को ही सबसे मजबूत प्रत्याशी माना गया। लेकिन पार्टी हाईकमान की पसोपेश के चलते टिकट घोषित करने में अच्छी-खासी देर लग गई।
2009 में भगवत ने बदल दिया था चुनावी गणित
पूर्व मंत्री भगवतसरन गंगवार वर्ष 2009 में भी सपा से लोकसभा प्रत्याशी बने थे। उनको उस चुनाव में भले ही वोट कम मिले थे और चुनाव में पराजित हो गए थे, लेकिन उस चुनाव में उन्होंने भाजपा का खेल बिगाड़ते हुए पूरा चुनावी गणित बदल दिया था। भाजपा की जीती हुई सीट उस समय कांग्रेस ने कड़े मुकाबले में उससे छीन ली थी। भगवत के दोबारा लोकसभा प्रत्याशी बनने के बाद भाजपा को अपने परंपरागत और सजातीय मतदाताओं के अपने पाले में रखने की चुनौती होगी।