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21 जून से शनि होने जा रहे हैं बक्री
Updated Fri, 16 Jun 2017 09:23 PM IST
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डॉ. पवन चंद्र
बरेली।
कर्मफलदाता शनिदेव 21 जून से वक्री होने जा रहे हैं। वह 26 अक्तूबर तक वक्री होकर धनु राषि से वृश्चिक राशि में भ्रमण करेंगे। इस दौरान समस्त राशियां इनके शुभाशुभ प्रभाव से प्रभावित होंगी। अगर किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में यदि जन्म के समय शनि ग्रह वक्री हो तो गोचर में वक्री होने पर उस ग्रह से संबंधित कार्य पूरे हो जाते हैं।
जानिए कब होते हैं शनि वक्री
ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप चौबे के मुताबिक शनि ग्रह सूर्य की परिक्त्रस्मा 29 वर्ष 5 माह 16 दिन 23 घंटा और 16 मिनट में पूर्ण करता है। स्थूल मान से शनि एक राशि पर लगभग 30 माह, एक नक्षत्र पर 400 दिन और नक्षत्र के एक चरण पर 100 दिन रहता है। यह प्रतिवर्ष लगभग 4 माह वक्री और 8 महीने मार्गी रहता है। सूर्य से 15 अंश की दूरी पर शनि ग्रह अस्त हो जाता है। अस्त होने के 38 दिन बाद उदय होता है। उदय के 135 दिन बाद मार्गी होता है और मार्गी के 105 दिन बाद पश्चिम दिशा में पुन:अस्त हो जाता है।
वक्त्रस्ी शनि देते हैं तनाव और संघर्ष से मुक्ति
जन्म समय में शनि वक्री हो तो गोचर में शनि के वक्री होने पर अशुभ शनि के प्रभाव से व्यक्ति को राहत मिलती है। वक्री शनि तनाव और संघर्ष से मुक्ति देते हैं। ऐसे समय में जातक उत्साह के साथ नई योजनाएं बनाता है और जागरूकता के साथ कार्य या व्यापार करता है। परंतु जन्म कुंडली में सिंह और धनु राशि का शनि हो तो अनुकूल न होकर प्रतिकूल प्रभाव देता है।
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बदलेगी शनि की साढ़े साती और ढैया
गोचर भ्रमणवश जब शनि किसी जातक की राशि से बारहवें, प्रथम या द्वितीय स्थान में हो तो यह शनि की साढ़ेसाती कहलाती है। वहीं चौथे या आठवें स्थान पर शनि संचार करें तब शनि की ढैया कहलाती है। शनि के वृश्चिक राशि में वक्री होते ही तुला राशि पर शनि की साढ़ेसाती प्रारंभ होगी, जबकि वृश्चिक और धनु राशि पर साढ़ेसाती यथावत् चलती रहेगी। वहीं इस दौरान मकर राशि के जातक साढ़ेसाती के प्रभाव से मुक्त हो जाएंगे। कन्या और वृष राशि से शनि की ढैया उतरकर सिंह और मेष राशि पर प्रारंभ होगी। परंतु ध्यान रहे जिनकी जन्म कुंडली में शनि श्रेष्ठ स्थान उच्च, स्वग्रही या मित्र राशि में हो और दशार्न्तदशा श्रेष्ठ चल रही हो तो उनके लिए शनि ढैया और साढ़ेसाती काल में अशुभ न होकर शुभ फलदायक ही रहेगा। परंतु चन्द्र और शनि अशुभ ग्रहों से युक्त होकर अशुभ भावों में बैठा हो तो ढैया और साढ़ेसाती नेष्ट फलप्रद होती है।
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बरेली।
कर्मफलदाता शनिदेव 21 जून से वक्री होने जा रहे हैं। वह 26 अक्तूबर तक वक्री होकर धनु राषि से वृश्चिक राशि में भ्रमण करेंगे। इस दौरान समस्त राशियां इनके शुभाशुभ प्रभाव से प्रभावित होंगी। अगर किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में यदि जन्म के समय शनि ग्रह वक्री हो तो गोचर में वक्री होने पर उस ग्रह से संबंधित कार्य पूरे हो जाते हैं।
जानिए कब होते हैं शनि वक्री
ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप चौबे के मुताबिक शनि ग्रह सूर्य की परिक्त्रस्मा 29 वर्ष 5 माह 16 दिन 23 घंटा और 16 मिनट में पूर्ण करता है। स्थूल मान से शनि एक राशि पर लगभग 30 माह, एक नक्षत्र पर 400 दिन और नक्षत्र के एक चरण पर 100 दिन रहता है। यह प्रतिवर्ष लगभग 4 माह वक्री और 8 महीने मार्गी रहता है। सूर्य से 15 अंश की दूरी पर शनि ग्रह अस्त हो जाता है। अस्त होने के 38 दिन बाद उदय होता है। उदय के 135 दिन बाद मार्गी होता है और मार्गी के 105 दिन बाद पश्चिम दिशा में पुन:अस्त हो जाता है।
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वक्त्रस्ी शनि देते हैं तनाव और संघर्ष से मुक्ति
जन्म समय में शनि वक्री हो तो गोचर में शनि के वक्री होने पर अशुभ शनि के प्रभाव से व्यक्ति को राहत मिलती है। वक्री शनि तनाव और संघर्ष से मुक्ति देते हैं। ऐसे समय में जातक उत्साह के साथ नई योजनाएं बनाता है और जागरूकता के साथ कार्य या व्यापार करता है। परंतु जन्म कुंडली में सिंह और धनु राशि का शनि हो तो अनुकूल न होकर प्रतिकूल प्रभाव देता है।
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बदलेगी शनि की साढ़े साती और ढैया
गोचर भ्रमणवश जब शनि किसी जातक की राशि से बारहवें, प्रथम या द्वितीय स्थान में हो तो यह शनि की साढ़ेसाती कहलाती है। वहीं चौथे या आठवें स्थान पर शनि संचार करें तब शनि की ढैया कहलाती है। शनि के वृश्चिक राशि में वक्री होते ही तुला राशि पर शनि की साढ़ेसाती प्रारंभ होगी, जबकि वृश्चिक और धनु राशि पर साढ़ेसाती यथावत् चलती रहेगी। वहीं इस दौरान मकर राशि के जातक साढ़ेसाती के प्रभाव से मुक्त हो जाएंगे। कन्या और वृष राशि से शनि की ढैया उतरकर सिंह और मेष राशि पर प्रारंभ होगी। परंतु ध्यान रहे जिनकी जन्म कुंडली में शनि श्रेष्ठ स्थान उच्च, स्वग्रही या मित्र राशि में हो और दशार्न्तदशा श्रेष्ठ चल रही हो तो उनके लिए शनि ढैया और साढ़ेसाती काल में अशुभ न होकर शुभ फलदायक ही रहेगा। परंतु चन्द्र और शनि अशुभ ग्रहों से युक्त होकर अशुभ भावों में बैठा हो तो ढैया और साढ़ेसाती नेष्ट फलप्रद होती है।