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शारदा पार जंगल का हो रहा विनाश
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पीलीभीत। शारदा नदी के पार टाटरगंज से लेकर लखीमपुर की सीमा तक पड़ने वाला जिले की सीमा का जंगल कई वर्ष पूर्व से लखीमपुर की संपूर्णानगर रेंज के हवाले होने से नष्ट होता जा रहा है। इसके अलावा नेपाल सीमा तक के जंगलों में पाए जाने वाले वन्यजीवों का भी संहार हो रहा है। खास बात यह है कि यहां के शिकारी व लकड़कट्टे न केवल शिकार को अंजाम दे रहे है। बल्कि जंगलों का भी विनाश करने से नहीं चूक रहे हैं। वहीं अवैध मामलों की कई बार शासन स्तर पर शिकायतें भी हो चुकी हैं।
शारदा नदी के पार टाटरगंज से लेकर जनपद सीमा तक कई किलोमीटर लंबे क्षेत्र में पड़ने वाले जंगल की सीमा तो जनपद में है, लेकिन देखरेख का जिम्मा लखीमपुर के अधीन है। वर्ष 1994 में प्रदेश सरकार ने एक शासनादेश जारी कर यह तय किया था कि जनपद सीमा में पड़ने वाला जंगल पीलीभीत वन प्रभाग में ही रहेगा। इसके अलावा उत्तराखंड क्षेत्र के खटीमा तक पड़ने वाला जिले का जंगल उत्तराखंड की सुरई रेंज को ट्रांसफर कर दिया गया था। वहीं उस दौरान शारदा नदी के पार एक तो नवाबों के जंगल का ठेकेदार सफाया कर रहे थे। इस सबके चलते जिले के वनाधिकारियों ने यह कहकर जंगल को लेने से आपत्ति कर दी थी कि उनके पास स्टाफ की कमी है। शारदा नदी के पार का क्षेत्र होने के चलते रखवाली का संचालन सही रूप से नहीं हो पाएगा। जिसके चलते टाटरगंज से लेकर लखीमपुर सीमा तक पड़ने वाला जंगल लखीमपुर की संपूर्णानगर रेंज के हवाले रखा गया था।
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शारदा नदी के पार टाटरगंज से लेकर जनपद सीमा तक कई किलोमीटर लंबे क्षेत्र में पड़ने वाले जंगल की सीमा तो जनपद में है, लेकिन देखरेख का जिम्मा लखीमपुर के अधीन है। वर्ष 1994 में प्रदेश सरकार ने एक शासनादेश जारी कर यह तय किया था कि जनपद सीमा में पड़ने वाला जंगल पीलीभीत वन प्रभाग में ही रहेगा। इसके अलावा उत्तराखंड क्षेत्र के खटीमा तक पड़ने वाला जिले का जंगल उत्तराखंड की सुरई रेंज को ट्रांसफर कर दिया गया था। वहीं उस दौरान शारदा नदी के पार एक तो नवाबों के जंगल का ठेकेदार सफाया कर रहे थे। इस सबके चलते जिले के वनाधिकारियों ने यह कहकर जंगल को लेने से आपत्ति कर दी थी कि उनके पास स्टाफ की कमी है। शारदा नदी के पार का क्षेत्र होने के चलते रखवाली का संचालन सही रूप से नहीं हो पाएगा। जिसके चलते टाटरगंज से लेकर लखीमपुर सीमा तक पड़ने वाला जंगल लखीमपुर की संपूर्णानगर रेंज के हवाले रखा गया था।
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