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हिंदू-मुसलमान की पहचान मिटा हैं होली के रंग
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The identity of Hindu-Muslim is erased by the colors of Holi
- फोटो : BANDA
बांदा। ऋषि बामदेव और बांदा नवाब के शहर में होली भी नायाब है। सन 1890 में बांदा नवाब अली बहादुर सानी ने यहां होलिकादहन की नींव रखी थी। आपसी सौहार्द इतना जबरदस्त था कि होली के रंग हिंदू-मुस्लिम की पहचान मिटा देते थे। इस वर्ष भी होली यहां सौहार्द के नए रंग बिखेरेगी। इसी दिन शबे बरात और जुमा की नमाज के साथ होली भी मनाई जाएगी।
यहां मिल-जुलकर होली मनाने की परंपरा बांदा नवाब के समय से चली आ रही है। नवाब जुल्फिकार अली बहादुर ने शहर के रहुनिया (खुटला) मैदान में होलिकादहन की शुरुआत कराई थी। इसी परंपरा में तत्कालीन प्रभावशाली मुस्लिम बुजुर्ग मुख्तार रहीम बख्श और नगर पालिका चेयरमैन डॉ. श्यामलाल शर्मा एक साथ कार में बैठकर शहर में घूमकर लोगों को होली की मुबारकबाद लेते-देते थे।
डॉ. अनवर (बलखंडी नाका), अमीन खां (जूते वाले, कोतवाली रोड), चौधरी रहीम (खुटला), मौला बख्श (मढ़िया नाका) होली की खास पहचान बन गए थे। प्रतिष्ठित चौधरी खानदान के जमींदार पहलवान सिंह, उमराव सिंह, रामराजा दुबे, चुनकई महाराज, भूरी महाराज मुस्लिम साथियों के साथ होली का जश्न मनाते थे। बुजुर्ग बताते हैं कि बलखंडी नाका की होली सबसे ज्यादा मशहूर थी। तांगे वाले मंजूर मियां इसके अगुवा थे। शहर के रईस और बैरिस्टर मसूदुज्जमां (बलखंडी नाका) होलियारों का हौसला बढ़ाते थे तब सिर्फ कुदरती रंगों से होली खेली जाती थी। कोई दुर्भावना नहीं होती थी।
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इस वर्ष होली के दिन जुमा (शुक्रवार) है। साथ ही शब-ए-बरात भी है। ऐसे में एक बार फिर शहर के बाशिंदों ने सौहार्द की वरासत और परंपरा को बरकरार रखते हुए तीनों पर्व मिलजुलकर मनाने का संकल्प लिया है। कलक्ट्रेट में आयोजित पीस कमेटी की बैठक में डीएम अनुराग पटेल और एसपी अभिनंदन की उपस्थिति में दोनों धर्मों के प्रतिष्ठित लोगों ने यही भरोसा दिलाया है।
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यहां मिल-जुलकर होली मनाने की परंपरा बांदा नवाब के समय से चली आ रही है। नवाब जुल्फिकार अली बहादुर ने शहर के रहुनिया (खुटला) मैदान में होलिकादहन की शुरुआत कराई थी। इसी परंपरा में तत्कालीन प्रभावशाली मुस्लिम बुजुर्ग मुख्तार रहीम बख्श और नगर पालिका चेयरमैन डॉ. श्यामलाल शर्मा एक साथ कार में बैठकर शहर में घूमकर लोगों को होली की मुबारकबाद लेते-देते थे।
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डॉ. अनवर (बलखंडी नाका), अमीन खां (जूते वाले, कोतवाली रोड), चौधरी रहीम (खुटला), मौला बख्श (मढ़िया नाका) होली की खास पहचान बन गए थे। प्रतिष्ठित चौधरी खानदान के जमींदार पहलवान सिंह, उमराव सिंह, रामराजा दुबे, चुनकई महाराज, भूरी महाराज मुस्लिम साथियों के साथ होली का जश्न मनाते थे। बुजुर्ग बताते हैं कि बलखंडी नाका की होली सबसे ज्यादा मशहूर थी। तांगे वाले मंजूर मियां इसके अगुवा थे। शहर के रईस और बैरिस्टर मसूदुज्जमां (बलखंडी नाका) होलियारों का हौसला बढ़ाते थे तब सिर्फ कुदरती रंगों से होली खेली जाती थी। कोई दुर्भावना नहीं होती थी।
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इस वर्ष होली के दिन जुमा (शुक्रवार) है। साथ ही शब-ए-बरात भी है। ऐसे में एक बार फिर शहर के बाशिंदों ने सौहार्द की वरासत और परंपरा को बरकरार रखते हुए तीनों पर्व मिलजुलकर मनाने का संकल्प लिया है। कलक्ट्रेट में आयोजित पीस कमेटी की बैठक में डीएम अनुराग पटेल और एसपी अभिनंदन की उपस्थिति में दोनों धर्मों के प्रतिष्ठित लोगों ने यही भरोसा दिलाया है।