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‘साहब की सवारी’ जाते ही अव्यवस्थाएं भारी
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
Updated Thu, 28 Jan 2016 12:20 AM IST
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बांदा। जिले की लोहिया ग्राम पंचायत पंडुई गांव को
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मुख्य सचिव आलोक रंजन भी सुविधाएं नहीं दिला पाए। उनके जाने के 10 दिन बाद
भी गांव के हालात में सुधार नहीं हुए हैं।
रामीण पीने के लिए पानी के लिए तरस रहे हैं। हैंडपंप बमुश्किल दो-तीन बाल्टी पानी देने के बाद जवाब दे जाते हैं। हालत यह है कि हैंडपंप पर पहले पानी भरने को लेकर मारामारी की नौबत रहती है। अमर उजाला ने पड़ुंई के ग्रामीणों की उम्मीदों और हकीकत की पड़ताल की।
इस दौरान ग्रामीणों की आंखों में आंसू छलक पड़े। उनका कहना था कि जब मुख्य सचिव कोई राहत नहीं दिला सकते तो अब किसी दूसरे से उम्मीद करना बेमानी होगा।
हाईवे से करीब तीन किलोमीटर दूर पंड़ुई गांव स्थित है। पिछले कुछ सालों में एक के बाद एक किसानों के आत्महत्या करने की वजह से यह गांव सुर्खियों में रहा है। यहां 13 जनवरी को मुख्य सचिव आलोक रंजन रात्रि विश्राम कर चुके हैं।
मुख्य सचिव ने चौपाल लगाकर ग्रामीणों का दर्द सुना था। तब ग्रामीणों को लगा कि उनकी एक-एक मांग को तवज्जो दी जाएगी। लेकिन चौपाल में किसानों को आत्महत्या का भी मुद्दा उठा था।
मुख्य सचिव को बताया गया कि आत्महत्या करने की मूल वजह पानी संकट है। नहर गांव तक बनी है, लेकिन वह सूखी है। नहर के सूखने की वजह से खेतों में धूल उड़ रही है।
गांव में प्रवेश करते ही एक हैंडपंप पर तमाम लोग पानी भरने के लिए कतारबद्ध दिखते हैं। स्कूल का रंगरोगन हो चुका है। कच्चे मकानों पर स्वच्छता संबंधी नारे चमक रहे हैं, लेकिन इन घरों में रहने वालों के चेहरे उदास हैं। आगे बढ़ने पर कच्चे घरों की संकरी गलियां हैं।
इन गलियों से होकर हम उस नीम के पेड़ के नीचे पहुंचते हैं, जहां मुख्य सचिव ने 24 जनवरी को ग्रामीणों का दर्द सुना था। गांव में कोई आया है, यह सुनते ही आसपास के लोगों की भीड़ जुट जाती है।
राम सामुझ बताते हैं कि जब मुख्य सचिव ही कोई राहत नहीं दिला पाए तो दूसरे अफसरों से क्या उम्मीद करें? वह बताते हैं कि सूखा राहत का चेक अभी तक नहीं मिला है।
इस बार उधारी पर बीज लेकर खेत में बोया, लेकिन सूखे की वजह से गेहूं के पौधे नष्ट हो गए हैं। जो बचे थे, उसे अन्ना पशुओं ने चट कर दिया। कुछ ऐसी ही शिकायत गांव के दूसरे लोग भी करते हैं।
इस गांव को लोगों का कहना है कि वे सरकार की ओर से मिलने वाली ज्यादातर सहूलियतों से महरूम हैं। किसान पुष्पेंद्र ने बताया कि मुख्य सचिव के जाने के बाद से गांव में किसी अधिकारी- कर्मचारी ने खैर खबर नहीं ली।
पानी के टैंकर भी नहीं आ रहे। ग्रामीणों के माथे पर इस चिंता की लकीरें साफ नजर आ रही हैं कि गर्मी के दिनों में उनकी प्यास कैसे और कहां से बुझेगी?
आपस में लड़ा रही है पानी की तड़प
लोहिया गांव पंडुई में ज्यादातर पिछड़ी व दलित जाति के लोग हैं। इनका आपस में बड़ा ही मेलजोल है, लेकिन पानी की तड़प उन्हें आपस में लड़ने के लिए विवश कर देती हैं।
ग्रामीणों की मानें तो मुख्य सचिव के आदेश के बाद भी न तो खराब हैंडपंपों की मरम्मत की गई और न ही टैंकर से जलापूर्ति की जा रही है।
ऐसी स्थिति में हैंडपंप तीन-चार बाल्टी पानी देने के बाद जवाब दे देते हैं। हर कोई पहले पानी भरना चाहता है। इसकी वजह से आपस में विवाद भी होने लगा है।
मुख्य सचिव के दौरे के दौरान प्रशासनिक अमले के डेरा डालने से इस गांव को हर समस्या से लगभग मुक्त होने की उम्मीद थी। ग्रामीण खुश थे, लेकिन 10 दिन बाद ही हालात बदल गए हैं।
अब पडुई में फिर पुराने दिन लौट आए हैं। पेयजल संकट गहराने लगा है। गांव मेें लगे तीन दर्जन से ज्यादा हैंडपंप भूजल स्तर नीचे खिसक जाने से भरपूर पानी नहीं दे रहे। कड़ाके की ठंड में भी पेयजल के लिए गांव की महिलाओं, बच्चों और पुरुषाें को हैंडपंप में पसीना बहाना पड़ रहा है।
रामीण पीने के लिए पानी के लिए तरस रहे हैं। हैंडपंप बमुश्किल दो-तीन बाल्टी पानी देने के बाद जवाब दे जाते हैं। हालत यह है कि हैंडपंप पर पहले पानी भरने को लेकर मारामारी की नौबत रहती है। अमर उजाला ने पड़ुंई के ग्रामीणों की उम्मीदों और हकीकत की पड़ताल की।
इस दौरान ग्रामीणों की आंखों में आंसू छलक पड़े। उनका कहना था कि जब मुख्य सचिव कोई राहत नहीं दिला सकते तो अब किसी दूसरे से उम्मीद करना बेमानी होगा।
हाईवे से करीब तीन किलोमीटर दूर पंड़ुई गांव स्थित है। पिछले कुछ सालों में एक के बाद एक किसानों के आत्महत्या करने की वजह से यह गांव सुर्खियों में रहा है। यहां 13 जनवरी को मुख्य सचिव आलोक रंजन रात्रि विश्राम कर चुके हैं।
मुख्य सचिव ने चौपाल लगाकर ग्रामीणों का दर्द सुना था। तब ग्रामीणों को लगा कि उनकी एक-एक मांग को तवज्जो दी जाएगी। लेकिन चौपाल में किसानों को आत्महत्या का भी मुद्दा उठा था।
मुख्य सचिव को बताया गया कि आत्महत्या करने की मूल वजह पानी संकट है। नहर गांव तक बनी है, लेकिन वह सूखी है। नहर के सूखने की वजह से खेतों में धूल उड़ रही है।
गांव में प्रवेश करते ही एक हैंडपंप पर तमाम लोग पानी भरने के लिए कतारबद्ध दिखते हैं। स्कूल का रंगरोगन हो चुका है। कच्चे मकानों पर स्वच्छता संबंधी नारे चमक रहे हैं, लेकिन इन घरों में रहने वालों के चेहरे उदास हैं। आगे बढ़ने पर कच्चे घरों की संकरी गलियां हैं।
इन गलियों से होकर हम उस नीम के पेड़ के नीचे पहुंचते हैं, जहां मुख्य सचिव ने 24 जनवरी को ग्रामीणों का दर्द सुना था। गांव में कोई आया है, यह सुनते ही आसपास के लोगों की भीड़ जुट जाती है।
राम सामुझ बताते हैं कि जब मुख्य सचिव ही कोई राहत नहीं दिला पाए तो दूसरे अफसरों से क्या उम्मीद करें? वह बताते हैं कि सूखा राहत का चेक अभी तक नहीं मिला है।
इस बार उधारी पर बीज लेकर खेत में बोया, लेकिन सूखे की वजह से गेहूं के पौधे नष्ट हो गए हैं। जो बचे थे, उसे अन्ना पशुओं ने चट कर दिया। कुछ ऐसी ही शिकायत गांव के दूसरे लोग भी करते हैं।
इस गांव को लोगों का कहना है कि वे सरकार की ओर से मिलने वाली ज्यादातर सहूलियतों से महरूम हैं। किसान पुष्पेंद्र ने बताया कि मुख्य सचिव के जाने के बाद से गांव में किसी अधिकारी- कर्मचारी ने खैर खबर नहीं ली।
पानी के टैंकर भी नहीं आ रहे। ग्रामीणों के माथे पर इस चिंता की लकीरें साफ नजर आ रही हैं कि गर्मी के दिनों में उनकी प्यास कैसे और कहां से बुझेगी?
आपस में लड़ा रही है पानी की तड़प
लोहिया गांव पंडुई में ज्यादातर पिछड़ी व दलित जाति के लोग हैं। इनका आपस में बड़ा ही मेलजोल है, लेकिन पानी की तड़प उन्हें आपस में लड़ने के लिए विवश कर देती हैं।
ग्रामीणों की मानें तो मुख्य सचिव के आदेश के बाद भी न तो खराब हैंडपंपों की मरम्मत की गई और न ही टैंकर से जलापूर्ति की जा रही है।
ऐसी स्थिति में हैंडपंप तीन-चार बाल्टी पानी देने के बाद जवाब दे देते हैं। हर कोई पहले पानी भरना चाहता है। इसकी वजह से आपस में विवाद भी होने लगा है।
मुख्य सचिव के दौरे के दौरान प्रशासनिक अमले के डेरा डालने से इस गांव को हर समस्या से लगभग मुक्त होने की उम्मीद थी। ग्रामीण खुश थे, लेकिन 10 दिन बाद ही हालात बदल गए हैं।
अब पडुई में फिर पुराने दिन लौट आए हैं। पेयजल संकट गहराने लगा है। गांव मेें लगे तीन दर्जन से ज्यादा हैंडपंप भूजल स्तर नीचे खिसक जाने से भरपूर पानी नहीं दे रहे। कड़ाके की ठंड में भी पेयजल के लिए गांव की महिलाओं, बच्चों और पुरुषाें को हैंडपंप में पसीना बहाना पड़ रहा है।