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पुलिस की फाइलों में गुम हो गए विसरा के अभिलेख
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पुलिस उपाधीक्षक राघवेंद्र सिंह।
- फोटो : BANDA
बांदा। मौत का राज खोलने वाले विसरा की जांच को लेकर पुलिस खास संवेदनशील नहीं है। अक्सर तो अदालत के आदेश के बाद विसरा परीक्षण के लिए भेजा जाता है। यह तभी सुरक्षित (प्रिजर्व) किया जाता है, जब पुलिस अधिकारी को लगता है कि इसकी जरूरत है। उधर, विसरा रखने में जितनी लापरवाही हो रही है, उतनी इसके अभिलेख रखने में।
मंडल मुख्यालय (बांदा) में पुलिस लाइन में स्थित विसरा संकलन कक्ष में रखे कई हजार विसरों का रिकार्ड (अभिलेख) पुलिस के कागजी पुलिंदों में कहीं गुम है। जिन विसरा के मुकदमे अदालत से निपट चुके हैं, उन्हें भी नष्ट नहीं किया गया, ये भी रखे हुए हैं। हालांकि वर्ष 2013 के बाद यहां विसरा रखना बंद हो चुका है। अब थानों मेें विसरा रखे जा रहे हैं।
राजकीय मेडिकल कालेज में इस वर्ष जुलाई से अब तक कुल 27 विसरा सुरक्षित किए गए हैं। इन्हें संबंधित थानों की पुलिस के हवाले कर दिया गया है। इन सभी विसरों में अब तक रिपोर्ट नहीं आई है। न ही इनके मुकदमे निस्तारित हुए हैं। मेडिकल कालेज के चीफ फार्मासिस्ट सियाराम चक्रवर्ती का कहना है कि इसके पूर्व के सुरक्षित किए गए विसरा के अभिलेख तत्कालीन चीफ फार्मासिस्ट विष्णु त्रिपाठी के पास थे। उनका निधन हो चुका है। अभिलेखों का कुछ पता नहीं है। हालांकि अपनी तैनाती के पिछले दो वर्षों के विसरा संबंधी पूरी जानकारी फार्मासिस्ट चक्रवर्ती नहीं दे पाए।
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विसरा रिपोर्ट में जहर के बाद भी रिहाई
बांदा। फौजदारी के वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक दीक्षित बताते हैं कि अक्सर बचाव पक्ष की दलीलों में दम होने पर विसरा रिपोर्ट से हटकर भी अदालत निर्णय देती है। उदाहरण के रूप में बताया कि वर्ष 2011 में चिल्ला थाना क्षेत्र के पलरा गांव के विद्याधर को नमकीन में जहर मिलाकर खिलाकर मार डालने का आरोप उसकी सगी बहन और समधी पर लगाया था। विसरा परीक्षण रिपोर्ट में जहर की पुष्टि भी हुई लेकिन उन्होंने (बचाव पक्ष) ने अदालत के सामने ऐसे साक्ष्य पेश किए कि आरोपी बरी कर दिए गए।
विसरा रिपोर्ट बिना नहीं की गिरफ्तारी
बांदा। सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक बालक राम बताते हैं कि अक्सर मामलों में पुलिस विसरा रिपोर्ट आने के बाद गिरफ्तारी करती है ताकि मात्र आरोप के आधार पर कोई निर्दोष जेल न जाए। उदाहरण के रूप में बताया कि हमीरपुर के जलालपुर थाने क्षेत्र में युवती की जहर से मौत हो गई। इसमें पति, सास और ससुर पर दहेज हत्या की रिपोर्ट दर्ज हुई, जबकि पति का कहना था कि किसी जहरीले कीड़े के काटने से मौत हुई। बताया कि उन्होंने विसरा रिपोर्ट न आने तक गिरफ्तारी नहीं की। बाद में यह जांच उनसे स्थानांतरित कर दी गई।
गृह सचिव ने स्वीकारा था, नहीं भेजा गया विसरा
बांदा। विसरा सुरक्षित रखने में हो रहीं लापरवाही पर अमर उजाला ने 25 जनवरी, 2013 को ‘सुरक्षित’ रखे विसरा को खा रहे चूहे-विषखापर, शीर्षक से फोटो सहित खबर छापी थी। उसके एक हफ्ते बाद पहली फरवरी, 2013 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विसरा को जांच के लिए समय से न भेजने पर तत्कालीन प्रमुख सचिव (गृह) और डीजीपी को तलब किया था।
इन दोनों वरिष्ठ अधिकारियों ने हाईकोर्ट को बताया था कि पिछले तीन वर्षों में प्रदेश में 1 लाख 38 हजार 500 पोस्टमार्टम हुए हैं। इनमें 88 प्रतिशत मामलों में विसरा सुरक्षित करने की आवश्यकता पड़ी। इन सुरक्षित किये गए विसरा में 65 प्रतिशत को जांच के लिए समय से लैब भेज दिया गया, जबकि 12 प्रतिशत मामलों में विसरा जांच के लिए समय से नहीं भेजा जा सका। हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई थी कि पुलिस की लापरवाही का फायदा अभियुक्तों को मिलता है।
अभिलेख नहीं हैं, पर्चे अदालत भेज दिए
बांदा। पुलिस उपाधीक्षक (सदर) राघवेंद्र सिंह का कहना है कि सुरक्षित किए गए विसरा संबंधी कोई अभिलेख नहीं हैं। लैब से जांच रिपोर्ट आने के बाद पर्चा काटकर अदालत भेज दिया जाता है। अब विसरा थानों में रखने की व्यवस्था है। जो पुराने या खराब थे उन्हें गड्ढे खोदकर दफन कर दिया गया। इनका कोई अभिलेख नहीं होता।
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मंडल मुख्यालय (बांदा) में पुलिस लाइन में स्थित विसरा संकलन कक्ष में रखे कई हजार विसरों का रिकार्ड (अभिलेख) पुलिस के कागजी पुलिंदों में कहीं गुम है। जिन विसरा के मुकदमे अदालत से निपट चुके हैं, उन्हें भी नष्ट नहीं किया गया, ये भी रखे हुए हैं। हालांकि वर्ष 2013 के बाद यहां विसरा रखना बंद हो चुका है। अब थानों मेें विसरा रखे जा रहे हैं।
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राजकीय मेडिकल कालेज में इस वर्ष जुलाई से अब तक कुल 27 विसरा सुरक्षित किए गए हैं। इन्हें संबंधित थानों की पुलिस के हवाले कर दिया गया है। इन सभी विसरों में अब तक रिपोर्ट नहीं आई है। न ही इनके मुकदमे निस्तारित हुए हैं। मेडिकल कालेज के चीफ फार्मासिस्ट सियाराम चक्रवर्ती का कहना है कि इसके पूर्व के सुरक्षित किए गए विसरा के अभिलेख तत्कालीन चीफ फार्मासिस्ट विष्णु त्रिपाठी के पास थे। उनका निधन हो चुका है। अभिलेखों का कुछ पता नहीं है। हालांकि अपनी तैनाती के पिछले दो वर्षों के विसरा संबंधी पूरी जानकारी फार्मासिस्ट चक्रवर्ती नहीं दे पाए।
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विसरा रिपोर्ट में जहर के बाद भी रिहाई
बांदा। फौजदारी के वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक दीक्षित बताते हैं कि अक्सर बचाव पक्ष की दलीलों में दम होने पर विसरा रिपोर्ट से हटकर भी अदालत निर्णय देती है। उदाहरण के रूप में बताया कि वर्ष 2011 में चिल्ला थाना क्षेत्र के पलरा गांव के विद्याधर को नमकीन में जहर मिलाकर खिलाकर मार डालने का आरोप उसकी सगी बहन और समधी पर लगाया था। विसरा परीक्षण रिपोर्ट में जहर की पुष्टि भी हुई लेकिन उन्होंने (बचाव पक्ष) ने अदालत के सामने ऐसे साक्ष्य पेश किए कि आरोपी बरी कर दिए गए।
विसरा रिपोर्ट बिना नहीं की गिरफ्तारी
बांदा। सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक बालक राम बताते हैं कि अक्सर मामलों में पुलिस विसरा रिपोर्ट आने के बाद गिरफ्तारी करती है ताकि मात्र आरोप के आधार पर कोई निर्दोष जेल न जाए। उदाहरण के रूप में बताया कि हमीरपुर के जलालपुर थाने क्षेत्र में युवती की जहर से मौत हो गई। इसमें पति, सास और ससुर पर दहेज हत्या की रिपोर्ट दर्ज हुई, जबकि पति का कहना था कि किसी जहरीले कीड़े के काटने से मौत हुई। बताया कि उन्होंने विसरा रिपोर्ट न आने तक गिरफ्तारी नहीं की। बाद में यह जांच उनसे स्थानांतरित कर दी गई।
गृह सचिव ने स्वीकारा था, नहीं भेजा गया विसरा
बांदा। विसरा सुरक्षित रखने में हो रहीं लापरवाही पर अमर उजाला ने 25 जनवरी, 2013 को ‘सुरक्षित’ रखे विसरा को खा रहे चूहे-विषखापर, शीर्षक से फोटो सहित खबर छापी थी। उसके एक हफ्ते बाद पहली फरवरी, 2013 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विसरा को जांच के लिए समय से न भेजने पर तत्कालीन प्रमुख सचिव (गृह) और डीजीपी को तलब किया था।
इन दोनों वरिष्ठ अधिकारियों ने हाईकोर्ट को बताया था कि पिछले तीन वर्षों में प्रदेश में 1 लाख 38 हजार 500 पोस्टमार्टम हुए हैं। इनमें 88 प्रतिशत मामलों में विसरा सुरक्षित करने की आवश्यकता पड़ी। इन सुरक्षित किये गए विसरा में 65 प्रतिशत को जांच के लिए समय से लैब भेज दिया गया, जबकि 12 प्रतिशत मामलों में विसरा जांच के लिए समय से नहीं भेजा जा सका। हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई थी कि पुलिस की लापरवाही का फायदा अभियुक्तों को मिलता है।
अभिलेख नहीं हैं, पर्चे अदालत भेज दिए
बांदा। पुलिस उपाधीक्षक (सदर) राघवेंद्र सिंह का कहना है कि सुरक्षित किए गए विसरा संबंधी कोई अभिलेख नहीं हैं। लैब से जांच रिपोर्ट आने के बाद पर्चा काटकर अदालत भेज दिया जाता है। अब विसरा थानों में रखने की व्यवस्था है। जो पुराने या खराब थे उन्हें गड्ढे खोदकर दफन कर दिया गया। इनका कोई अभिलेख नहीं होता।