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Banda News: राशन अंत्योदय, बीपीएल कार्ड से... कागजों में गरीबी दूर
Mon, 08 Dec 2025 11:49 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
Updated Mon, 08 Dec 2025 11:49 PM IST
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फोटो - 03 बेंदा गांव में लगा राशन कार्ड धारकों का साइन बोर्ड। संवाद
- फोटो : मेडिकल कॉलेज में जेट्रोफा का फल खाकर भर्ती शिवा
जसपुरा। तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आंकड़े झूठे हैं...ये दावा किताबी है। मशहूर शायर अदम गोंडवी का यह शेर ने प्रदेश के पंचायती राज विभाग द्वारा हाल ही में जारी गांवों के एक्सपोजर विजिट पर सटीक बैठता है। सूची में शामिल बांदा जनपद का बेंदा गांव इसकी बानगी है। जहां कागजों में गांव के 1289 लोगों को रईस दिखा दिया गया। जबकि हकीकत यह है कि प्रदेश सरकार इस गांव में 1289 लोगों को गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाला मानते हुए उन्हें पात्र गृहस्थ (बीपीएल) व अतिनिर्धन अंत्योदय के राशन कार्ड जारी किए हैं। दूसरी तरफ गांव को गरीबी मुक्त बताया जा रहा है। अमर उजाला की पड़ताल ने बेंदा की बदहाली की सच्ची तस्वीर पेश करते हुए सरकारी दावे पर सवाल खड़ा किया है।
पैलानी तहसील के बेंदा गांव की आबादी 14,000 है। इसके बाद भी यह गांव बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। गांव में कुल 43 मजरे हैं। दो कोटेदार पुष्पेंद्र सिंह और रंजना सिंह द्वारा क्रमशः 490 व 622 पात्र गृहस्थी (बीपीएल) तथा 74 व 103 अंत्योदय कार्ड धारकों को सरकार की ओर से मुफ्त राशन योजना का लाभ दिया जा रहा है। गांव में एक हजार परिवार रहते हैं। इनमें 385 के पास प्रधानमंत्री आवास और 25 के पास मुख्यमंत्री आवास हैं।
करीब 300 परिवारों के पास पक्का मकान व रोजगार नहीं है। इतना ही नहीं एक इंच कृषि भूमि भी नहीं है। मजदूरी से किसी तरह घर चल रहा है। इन्हें कृषि व आवासीय पट्टे भी नहीं दिए गए। आर्थिक बदहाली के बीच यह जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। एक्सपोजर विजिट में गरीब मुक्त गांव को लेकर न केवल लोग आश्चर्य में है बल्कि प्रधान भी इस विजिट से संतुष्ट नहीं हैं।
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केस-
39 वर्षीय भावना, पत्नी रमेश यादव परिवार सहित कच्चे मकान में रहती हैं। आजतक उन्हें किसी भी योजना के तहत आवास या कृषि पट्टा नहीं मिला। रमेश प्राइवेट गाड़ी चलाकर किसी तरह परिवार का खर्च उठा रहे हैं। आयुष्मान योजना का भी लाभ नहीं मिला है।
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केस-2
नत्थू वर्मा मजदूरी करके पांच लोगों का परिवार चलाते हैं। झोपड़ी वाले कच्चे मकान में रहते हैं। आवास व राशनकार्ड, शौचालय आदि कोई भी योजना का लाभ उसे नहीं मिला। रुपयों के अभाव में बेटियां जूनियर तक की शिक्षा के बाद घर बैठ गईं।
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केस-3
पान कुमारी का कहना है कि पति-पत्नी मजदूरी करके घर चलाते हैं लेकिन कई दिनों तक काम नहीं मिलता। मनरेगा में काम नहीं मिलता तो शहर मजदूरी करने जाते हैं। एक दिन मजदूरी नहीं मिलती तो घर का चूल्हा नहीं जलता है।
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केस-4
मनोज का कहना है कि उनके पास कृषि भूमि नहीं है। मजदूरी करके परिवार का खाना खर्चा चलता है। उनका राशनकार्ड भी नहीं बना। खाने पीने का कोई भरोसा नहीं है। जितना रोज कमा लें, उसी से गुजारा होता है अन्यथा भूखे ही सोना पड़ता है।
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गांव की तस्वीर एक नजर में
गांव की आबादी- 14,000
कच्चे मकान- 3,000
अंत्योदय राशन कार्ड- 177
बीपीएल राशन कार्ड- 1,112
पीएम आवास- 385
सीएम आवास- 25
भूमिहीन- 504
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कैसे हो गया गरीबी मुक्त गांव
प्रधान ब्रजेश कुमार खुद असमंजस में हैं कि गांव कैसे गरीबी मुक्त हो गया। प्रधान का कहना है कि गांव को गरीब मुक्त बनाने में अभी 10 साल लग जाएंगे। गांव में विकास हुआ है लोगों को योजनाओं का लाभ दिलाया जा रहा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गांव में गरीब ही नहीं है।
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वर्जन
एक्सपोजर विजिट में कोई कमी रह गई है तो दोबारा विजिट कराकर सही तत्थों को दिया जाएगा।
- परवेज आलम, उप निदेशक पंचायत
चित्रकूटधाम मंडल बांदा
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पैलानी तहसील के बेंदा गांव की आबादी 14,000 है। इसके बाद भी यह गांव बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। गांव में कुल 43 मजरे हैं। दो कोटेदार पुष्पेंद्र सिंह और रंजना सिंह द्वारा क्रमशः 490 व 622 पात्र गृहस्थी (बीपीएल) तथा 74 व 103 अंत्योदय कार्ड धारकों को सरकार की ओर से मुफ्त राशन योजना का लाभ दिया जा रहा है। गांव में एक हजार परिवार रहते हैं। इनमें 385 के पास प्रधानमंत्री आवास और 25 के पास मुख्यमंत्री आवास हैं।
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करीब 300 परिवारों के पास पक्का मकान व रोजगार नहीं है। इतना ही नहीं एक इंच कृषि भूमि भी नहीं है। मजदूरी से किसी तरह घर चल रहा है। इन्हें कृषि व आवासीय पट्टे भी नहीं दिए गए। आर्थिक बदहाली के बीच यह जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। एक्सपोजर विजिट में गरीब मुक्त गांव को लेकर न केवल लोग आश्चर्य में है बल्कि प्रधान भी इस विजिट से संतुष्ट नहीं हैं।
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केस-
39 वर्षीय भावना, पत्नी रमेश यादव परिवार सहित कच्चे मकान में रहती हैं। आजतक उन्हें किसी भी योजना के तहत आवास या कृषि पट्टा नहीं मिला। रमेश प्राइवेट गाड़ी चलाकर किसी तरह परिवार का खर्च उठा रहे हैं। आयुष्मान योजना का भी लाभ नहीं मिला है।
केस-2
नत्थू वर्मा मजदूरी करके पांच लोगों का परिवार चलाते हैं। झोपड़ी वाले कच्चे मकान में रहते हैं। आवास व राशनकार्ड, शौचालय आदि कोई भी योजना का लाभ उसे नहीं मिला। रुपयों के अभाव में बेटियां जूनियर तक की शिक्षा के बाद घर बैठ गईं।
केस-3
पान कुमारी का कहना है कि पति-पत्नी मजदूरी करके घर चलाते हैं लेकिन कई दिनों तक काम नहीं मिलता। मनरेगा में काम नहीं मिलता तो शहर मजदूरी करने जाते हैं। एक दिन मजदूरी नहीं मिलती तो घर का चूल्हा नहीं जलता है।
केस-4
मनोज का कहना है कि उनके पास कृषि भूमि नहीं है। मजदूरी करके परिवार का खाना खर्चा चलता है। उनका राशनकार्ड भी नहीं बना। खाने पीने का कोई भरोसा नहीं है। जितना रोज कमा लें, उसी से गुजारा होता है अन्यथा भूखे ही सोना पड़ता है।
गांव की तस्वीर एक नजर में
गांव की आबादी- 14,000
कच्चे मकान- 3,000
अंत्योदय राशन कार्ड- 177
बीपीएल राशन कार्ड- 1,112
पीएम आवास- 385
सीएम आवास- 25
भूमिहीन- 504
कैसे हो गया गरीबी मुक्त गांव
प्रधान ब्रजेश कुमार खुद असमंजस में हैं कि गांव कैसे गरीबी मुक्त हो गया। प्रधान का कहना है कि गांव को गरीब मुक्त बनाने में अभी 10 साल लग जाएंगे। गांव में विकास हुआ है लोगों को योजनाओं का लाभ दिलाया जा रहा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गांव में गरीब ही नहीं है।
वर्जन
एक्सपोजर विजिट में कोई कमी रह गई है तो दोबारा विजिट कराकर सही तत्थों को दिया जाएगा।
- परवेज आलम, उप निदेशक पंचायत
चित्रकूटधाम मंडल बांदा

फोटो - 03 बेंदा गांव में लगा राशन कार्ड धारकों का साइन बोर्ड। संवाद- फोटो : मेडिकल कॉलेज में जेट्रोफा का फल खाकर भर्ती शिवा

फोटो - 03 बेंदा गांव में लगा राशन कार्ड धारकों का साइन बोर्ड। संवाद- फोटो : मेडिकल कॉलेज में जेट्रोफा का फल खाकर भर्ती शिवा

फोटो - 03 बेंदा गांव में लगा राशन कार्ड धारकों का साइन बोर्ड। संवाद- फोटो : मेडिकल कॉलेज में जेट्रोफा का फल खाकर भर्ती शिवा