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गोवर्द्धन पर्वत और मृत्यु के देवता यम को पूजा
अमर उजाला ब्यूरो, बांदा
Updated Fri, 09 Nov 2018 11:30 PM IST
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भाई को तिलक कर भइयादूज मनाती बहन।
- फोटो : अमर उजाला
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दिवाली के बाद गोवर्द्धन पूजा और भइयादूज की धूम रही। घरों में गोबर के प्रतीकात्मक गोवर्द्धन पर्वत बनाकर पूजे गए। अगले दिन मृत्यु के देवता यम की पूजा हुई। इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। भाई-बहन के अपार प्रेम और समर्पण के प्रतीक भइयादूज पर विवाहित महिलाओं ने ससुराल से मायके आकर भाइयों का तिलक किया और उनकी लंबी उम्र की प्रार्थना की।
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गुरुवार को गोवर्धन पूजा का दिन था। यह कार्तिक मास की शु़ल्क पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इसे अन्नकूट पूजा भी कहते हैं। घरों के आंगन में गोबर से प्रतीकात्मक गोवर्द्धन पर्वत बनाए गए। भगवान गोवर्द्धन की पूजा हुई। श्रद्धालुओं ने गायों की विशेष सेवा की। कहा जाता है कि इस पर्व का सीधा संबंध प्रकृति और मानव से है। श्रीकृष्ण ने गोकुल के लोगों को गोवर्द्धन की पूजा के लिए प्रेरित किया था।
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देवराज इंद्र के अहंकार का नाश किया था। तभी से यह पूजा चली आ रही है। शुक्रवार को कार्तिक शुल्क पक्ष की द्वितीया को भइयादूज मनाई गई। इसे भातृ द्वितीया भी कहा जाता है। घर-घर इसकी धूम रही। मासूमों से लेकर विवाहित भाई-बहनों तक ने पूरे हर्षोल्लास और श्रद्धा से परंपरायें निभाईं। एक ही साथ रहने वाले भाई-बहनों ने साथ में बैठकर खाना खाया। बहनों ने भाइयों के तिलक लगाकर उनकी आरती उतारी। लंबी उम्र की कामना की। बड़ी संख्या में भाई बहनों के ससुराल पहुंचे और यह परंपरा निभाई। बड़ी संख्या में भाई-बहनों ने नए वस्त्र पहनें। विधिविधान के साथ यम की पूजा की।
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बबेरू, नरैनी, अतर्रा, तिंदवारी, बदौसा, बेंदाघाट, करतल, चिल्ला, जसपुरा, पैलानी, मटौंध, खप्टिहाकलां, कमासिन, मरका, ओरन, खुरहंड, गिरवां, बड़ोखर बुजुर्ग आदि क्षेत्रों में भी गोर्वधन पूजा और भइयादूज हर्षोल्लास के साथ मनाई गई।