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Banda News: फिजीशियन कर रहे सीने में दर्द का इलाज
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बांदा। जिला अस्पताल में चेस्ट स्पेशलिस्ट न होने से सीने में दर्द की शिकायत लेकर आने वाले मरीजों का इलाज फिजिशियन के सहारे ही हो रहा है। ऐसे में अक्सर टीबी जांचने में देरी हो जाती है। मरीज को जब तक टीबी का पता चलता है, तब तक उसका मर्ज बढ़ चुका होता है।
हैरत की बात तो यह है कि जिम्मेदार कई बार इस संदर्भ में शासन को पत्राचार भी कर चुके हैं, लेकिन अस्पताल को अभी तक एक चेस्ट विशेषज्ञ नहीं मिल सका है। जनवरी से अब तक 400 से ज्यादा मरीजों को टीवी रोग के लिए चिह्नित किया जा चुका है। जिला अस्पताल में प्रतिदिन 15 से 20 मरीज सीने से संबंधित बीमारी को लेकर दिखाने पहुंच रहे हैं।
जिला अस्पताल में चेस्ट विशेषज्ञ का पद रिक्त चल रहा है। यहां एक भी स्पेशलिस्ट न होने की वजह से जिला अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों की फिजिशियन जब तक जांच कराकर रोग पकड़ते हैं तब तक वह टीवी, सियोपीडी, ब्रोमकियल अस्थमा, ब्रोनकाइटिस, निमोनिया, पायोथेरेक्स आदि गंभीर रोगों के शिकार हो जाते हैं।
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अस्पताल में प्रतिदिन 10 से 15 मरीज खांसी, सांस फूलना जैसी शिकायत लेकर फिजिशियन डॉक्टर के पास पहुंचते हैं। थोड़े दिन तो सलाह व दवाओं से काम चलाया जाता है। आराम न मिलने पर फिर जांच की बारी आती है। फिर जब तक रिपोर्ट हाथ लगती है तब तक मरीज टीबी व अन्य गंभीर बीमारियों की गिरफ्त में आ चुका होता है। चेस्ट स्पेशलिस्ट के न होने से मरीजों को हायर सेंटर में रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज बांदा, झांसी, कानपुर आदि रेफर किया जाता है।
जनवरी से अब तक टीबी 413 मरीज मिले
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हैरत की बात तो यह है कि जिम्मेदार कई बार इस संदर्भ में शासन को पत्राचार भी कर चुके हैं, लेकिन अस्पताल को अभी तक एक चेस्ट विशेषज्ञ नहीं मिल सका है। जनवरी से अब तक 400 से ज्यादा मरीजों को टीवी रोग के लिए चिह्नित किया जा चुका है। जिला अस्पताल में प्रतिदिन 15 से 20 मरीज सीने से संबंधित बीमारी को लेकर दिखाने पहुंच रहे हैं।
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जिला अस्पताल में चेस्ट विशेषज्ञ का पद रिक्त चल रहा है। यहां एक भी स्पेशलिस्ट न होने की वजह से जिला अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों की फिजिशियन जब तक जांच कराकर रोग पकड़ते हैं तब तक वह टीवी, सियोपीडी, ब्रोमकियल अस्थमा, ब्रोनकाइटिस, निमोनिया, पायोथेरेक्स आदि गंभीर रोगों के शिकार हो जाते हैं।
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अस्पताल में प्रतिदिन 10 से 15 मरीज खांसी, सांस फूलना जैसी शिकायत लेकर फिजिशियन डॉक्टर के पास पहुंचते हैं। थोड़े दिन तो सलाह व दवाओं से काम चलाया जाता है। आराम न मिलने पर फिर जांच की बारी आती है। फिर जब तक रिपोर्ट हाथ लगती है तब तक मरीज टीबी व अन्य गंभीर बीमारियों की गिरफ्त में आ चुका होता है। चेस्ट स्पेशलिस्ट के न होने से मरीजों को हायर सेंटर में रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज बांदा, झांसी, कानपुर आदि रेफर किया जाता है।
जनवरी से अब तक टीबी 413 मरीज मिले