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बुंदेलखंड में लहलहाएगी प्राकृतिक खेती
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बांदा। केंद्र सरकार के बाद अब प्रदेश सरकार ने भी अपने बजट में प्राकृतिक खेती को शामिल किया है। प्रदेश सरकार ने मुख्य रूप से इसे बुंदेलखंड के लिए स्थान दिया है। हालांकि प्राकृतिक खेती को लेकर राज्य सरकार पूर्व से ही कई कदम उठा चुकी है। इसी के तहत प्राकृतिक खेती से पैदा हो रहे अनाज के लिए मंडल मुख्यालयों में टेस्टिंग लैब स्थापित किए जा रहे हैं। बजट में इसके प्रावधान से बुंदेलखंड में जैविक खेती को बढ़ावा मिलने के आसार हैं।
कृषि विभाग के अधिकारी और किसान दोनों ही इससे काफी उत्साहित हैं। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में प्राकृतिक खेती ही किसानों के अच्छे दिन ला सकती है। इसका मुख्य आधार गोवंश पालन है। इससे अन्ना प्रथा पर भी रोक लगेगी।
प्राकृतिक खेती के फायदे
भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि होती है। सिंचाई की कम जरूरत पड़ती है। रासायनिक खाद पर निर्भरता नहीं होती। लागत कम आती है। उत्पादन में वृद्धि होती है। बाजार में प्राकृतिक खेती वाले उत्पादों की मांग बढ़ने से किसानों की आय में वृद्धि होती है। प्राकृतिक खेती के पैरोकार किसान और विशेषज्ञ बताते हैं कि रासायनिक खाद और कीटनाशक उपयोग से जमीन की उर्वरक क्षमता खत्म हो जाती है। यह भूमि के लिए बहुत हानिकारक है। इसमें पैदा होने वाले खाद्य पदार्थ भी सेहत के लिए नुकसानदेह है। मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ रहा है।
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बुंदेलखंड में खेती के खुलेंगे नए आयाम
बड़ोखर खुर्द के प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह का कहना है कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने से लागत घटेगी और पैदावार बढ़ेगी। यह भी देखना है कि सरकार की यह मंशा धरातल पर कितने कारगर रूप से अमल में आती है। जो अधिकारी रासायनिक खेती की पैरवी करते थे उन्हें अब सरकार की मंशा के अनुरूप प्राकृतिक खेती पर जुटना होगा। लेकिन मानक निर्धारण बहुत जरूरी है।
चित्रकूटधाम मंडल के संयुक्त कृषि निदेशक उमेश कटियार का कहना है कि बुंदेलखंड में सातों जिलों में 25 लाख हेक्टेयर से ज्यादा खाली पड़ी भूमि में मोटा अनाज कठिया, सांवा कोदा (कुटकी), काकुन सहित औषधि पौधे कैथा, इमली, आंवला, जामुन, बेर और महुआ की बागवानी की जाएगी। बुंदेलखंड में 85 लाख हेक्टेअर कृषि भूमि है। इसमें 60 लाख हेक्टेअर भूमि में खेती की जाती है। शेष परती व बंजर है।
जैविक खाद-बीज में मिलेगी 80 फीसदी छूट
उप कृषि निदेशक विजय कुमार का कहना है कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए यहां किसानों को 80 फीसदी सब्सिडी पर जैविक खाद व बीज उपलब्ध कराया जाएगा। इसके लिए गांवों में किसानों से गोबर खरीदने की भी योजना है। ग्राम पंचायत स्तर पर खाद गड्ढों का निर्माण कराया गया है। इससे गो पालन को बढ़ावा मिलेगा। ढैंचा, सनई खाद के बीज भी दिए जाएंगे। केचुआ खाद के लिए प्रेरित किया जाएगा।
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कृषि विभाग के अधिकारी और किसान दोनों ही इससे काफी उत्साहित हैं। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में प्राकृतिक खेती ही किसानों के अच्छे दिन ला सकती है। इसका मुख्य आधार गोवंश पालन है। इससे अन्ना प्रथा पर भी रोक लगेगी।
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प्राकृतिक खेती के फायदे
भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि होती है। सिंचाई की कम जरूरत पड़ती है। रासायनिक खाद पर निर्भरता नहीं होती। लागत कम आती है। उत्पादन में वृद्धि होती है। बाजार में प्राकृतिक खेती वाले उत्पादों की मांग बढ़ने से किसानों की आय में वृद्धि होती है। प्राकृतिक खेती के पैरोकार किसान और विशेषज्ञ बताते हैं कि रासायनिक खाद और कीटनाशक उपयोग से जमीन की उर्वरक क्षमता खत्म हो जाती है। यह भूमि के लिए बहुत हानिकारक है। इसमें पैदा होने वाले खाद्य पदार्थ भी सेहत के लिए नुकसानदेह है। मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ रहा है।
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बुंदेलखंड में खेती के खुलेंगे नए आयाम
बड़ोखर खुर्द के प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह का कहना है कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने से लागत घटेगी और पैदावार बढ़ेगी। यह भी देखना है कि सरकार की यह मंशा धरातल पर कितने कारगर रूप से अमल में आती है। जो अधिकारी रासायनिक खेती की पैरवी करते थे उन्हें अब सरकार की मंशा के अनुरूप प्राकृतिक खेती पर जुटना होगा। लेकिन मानक निर्धारण बहुत जरूरी है।
चित्रकूटधाम मंडल के संयुक्त कृषि निदेशक उमेश कटियार का कहना है कि बुंदेलखंड में सातों जिलों में 25 लाख हेक्टेयर से ज्यादा खाली पड़ी भूमि में मोटा अनाज कठिया, सांवा कोदा (कुटकी), काकुन सहित औषधि पौधे कैथा, इमली, आंवला, जामुन, बेर और महुआ की बागवानी की जाएगी। बुंदेलखंड में 85 लाख हेक्टेअर कृषि भूमि है। इसमें 60 लाख हेक्टेअर भूमि में खेती की जाती है। शेष परती व बंजर है।
जैविक खाद-बीज में मिलेगी 80 फीसदी छूट
उप कृषि निदेशक विजय कुमार का कहना है कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए यहां किसानों को 80 फीसदी सब्सिडी पर जैविक खाद व बीज उपलब्ध कराया जाएगा। इसके लिए गांवों में किसानों से गोबर खरीदने की भी योजना है। ग्राम पंचायत स्तर पर खाद गड्ढों का निर्माण कराया गया है। इससे गो पालन को बढ़ावा मिलेगा। ढैंचा, सनई खाद के बीज भी दिए जाएंगे। केचुआ खाद के लिए प्रेरित किया जाएगा।