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शजर हस्तशिल्पियों के आ सकते हैं अच्छे दिन

Fri, 18 Feb 2022 11:14 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Fri, 18 Feb 2022 11:14 PM IST
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May good days come for Shajar handicrafts
फोटो-18बीएनडीपी-3 : शजर पत्थर से तैयार की वस्तुएं दिखाते शजर शिल्पी नजीर बेग। - फोटो : BANDA
बांदा। बुंदेलखंड की प्रमुख केन नदी में पाए जाने वाले दुर्लभ शजर पत्थर यहां पर कई दशक पहले ही उद्योग का रूप ले चुका था। दक्ष शजर हस्तशिल्पियों द्वारा तैयार किए गए पत्थरों के सजावटी आइटम और जेवरों की दुनिया के अधिकांश देशों में मांग थी।
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खासकर ईरान और इराक में इस कुदरती करिश्मे वाले पत्थर के खास कद्रदान थे। लेकिन एक-दो दशकों से यह उद्योग खात्मे की कगार पर पहुंच गया है। लेकिन अब इस उद्योग के अच्छे दिन आने के आसार बन गए हैं।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को पड़ोसी जनपद फतेहपुर की जनसभा में भरोसा दिलाया है कि शजर पत्थर को विश्व स्तर पर जल्द ही बाजार दिलवाएंगे।
केंद्र और राज्य सरकारों की महत्वाकांक्षी योजना एक जनपद-एक उत्पाद (ओडीओपी) में भी बांदा जनपद में शजर पत्थर उद्योग को ही चुना गया है। उद्योग विभाग के माध्यम से शजर हस्तशिल्पियों को ऋण आदि सुविधाएं दिलाकर उन्हें स्वरोजगार के साथ ही शजर पत्थर को अपने पुराने स्वरूप में लाने की कवायदें की जा रही हैं। प्रधानमंत्री की घोषणा धरातल पर सही साबित हुई तो शजर व्यवसाय से जुड़े सैकड़ों परिवारों के अच्छे दिन आ जाएंगे।
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ज्वैलरी और अन्य वस्तुएं होती हैं तैयार
बांदा। केन नदी देश की इकलौती नदी है जिसमें कुदरत का नायाब नमूना शजर पत्थर पाया जाता है। इस पत्थर में रंगीन चित्रकारी होती है। ऊपर से बेडौल और बदसूरत नजर आने वाला यह पत्थर हस्तशिल्पियों के हाथों तराशे जाने के बाद खूबसूरत स्वरूप में बदल जाता है। अंगूठी, लॉकेट आदि ज्वैलरी में नगीनों के स्थान पर इस पत्थर को शौकीन लोग जड़वाते हैं। इसके अलावा यहां के हस्तशिल्पियों ने ताजमहल, पेपर वेट, छड़ी, पानदान इत्यादि तमाम वस्तुएं इस पत्थर से तराश कर बनाई हैं। इन्हें देश और केंद्र सरकार के स्तर पर पुरस्कृत भी किया गया है।
450 वर्ष पूर्व अरब के लोगों ने खोजा था शजर पत्थर
बांदा। शजर पत्थर की खोज लगभग 450 वर्ष पूर्व हुई थी। इसे अरब से आए लोगों ने पहचाना था। पत्थर के अंदर पेड़, पत्ती, झाड़ियां और अक्सर जीवों की आकृतियां विभिन्न रंगों में होती हैं। ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने अपने कार्यकाल में दिल्ली दरबार में प्रदर्शनी लगवाई थी। इसमें शजर पत्थर भी शामिल था। रानी विक्टोरिया को यह पसंद आया और वह अपने साथ ले गईं।
राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुके हैं द्वारिका सोनी
बांदा। शजर हस्तशिल्प में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हो चुके बांदा के शजर कारोबारी द्वारिका प्रसाद सोनी ओडीओपी योजना में लाभार्थी हैं। वह मशीनें लगाकर शजर पत्थर का कारोबार करते हैं। वह बताते हैं कि इराक, ईरान, फ्रांस, दुबई, अमेरिका सहित मुस्लिम देशों में इसकी मांग बहुत है। भारत सरकार उन्हें तंजानिया और नीदरलैंड में प्रदर्शनियों में भाग लेने के लिए भेज चुकी है। उन्होंने वहां शजर पत्थर का प्रदर्शन किया था। अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसे बढ़ावा दे रहे हैं।
पुश्तैनी पेशे से मायूस हैं खानदानी हस्तशिल्पी
बांदा। शजर पत्थर के खानदानी हस्तशिल्पी मर्दन नाका निवासी नजीर बेग शजर उद्योग और हस्तशिल्प कला में अनेकों बार राज्य और केंद्र सरकार के पुरस्कार पा चुके हैं। इनके पास आज भी शजर से तराशी गई वस्तुओं का जखीरा है। इनके पिता याकूब बेग भी शजर के दक्ष कारीगर थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इनके मर्दन नाका स्थित घर आकर शजर पत्थर की आकृतियों का अवलोकन किया था और सराहा था। नजीर बताते हैं कि शजर पत्थर बेनजीर है। अरब देशों में इसे हकीक और स्फटिक नाम से भी जाना जाता है। हालांकि इधर काफी अरसे से शजर वस्तुओं की मार्केट न मिलने से नजीर बेग का व्यवसाय काफी प्रभावित हुआ है। वह आर्थिक तंगी से भी जूझ रहे हैं। वह बताते हैं कि अनुभव और दक्षता के बावजूद उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिला है।
शजर आकृति को लेकर किंवदंतियां
बांदा। शजर पत्थर में पाई जाने वाली आकर्षक आकृतियों को लेकर विभिन्न किंवदंतियां हैं। कुछ लोगों का कहना है कि शरद पूर्णिमा की चांदनी रात में चांद की किरणें इस पत्थर पर पड़ती हैं तो उनमें कुदरती आकृति उभर आती है। आकृतियों में पेड़-पौधे, झाड़ियां, पशु-पक्षी, मानव, नदी की जलधारा आदि शामिल हैं। उधर, वैज्ञानिकों की नजर में शजर पत्थर में उभरने वाली आकृति फंगस ग्रोथ है।

बांदा के प्रमुख शजर शिल्पी
नजीर बेग (मर्दन नाका), द्वारिका प्रसाद सोनी (बलखंडी नाका), डा.सतीशचंद्र भट्ट (फूटाकुआं), मोहम्मद मुबीन (निम्नीपार), हरिमोहन तिवारी (कैलाशपुरी), कैलाश जड़िया (चौक बाजार), मोहम्मद आसिफ (निम्नीपार), उमेश कुमार (जरैली कोठी), मधु खरे (फूटाकुआं), माता प्रसाद खरे (मर्दन नाका)।

फोटो-18बीएनडीपी-4 : शजर पत्थर से तैयार किए गए नगीने।

फोटो-18बीएनडीपी-4 : शजर पत्थर से तैयार किए गए नगीने।- फोटो : BANDA

फोटो-18बीएनडीपी-2 : मशीन पर शजर पत्थर को तराशते द्वारिका सोनी।

फोटो-18बीएनडीपी-2 : मशीन पर शजर पत्थर को तराशते द्वारिका सोनी। - फोटो : BANDA

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