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Banda News: महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बाजार का जुड़ाव जरूरी
Sat, 28 Feb 2026 12:14 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
Updated Sat, 28 Feb 2026 12:14 AM IST
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फोटो- 17 किसान मेले के दूसरे दिन मंच में महिला शक्ति का रहा बोलबाला। संवाद
- फोटो : रायबरेली में बछरावां थाना में डंपर मालिक और एआरटीओ से होती बहस।
बांदा। कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित उत्तर क्षेत्रीय किसान मेले में दूसरे दिन वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने किसानों को बुंदेलखंड की जलवायु के अनुरूप खेती की नई तकनीकों से अवगत कराया। इस अवसर पर उद्यानिकी, महिला सशक्तिकरण, पोषण सुरक्षा तथा टिकाऊ आजीविका के विभिन्न पहलुओं पर गहन मंथन हुआ। वैज्ञानिकों ने ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऋण, कृषि संसाधन और बाजार से जुड़ाव के महत्व पर प्रकाश डाला। साथ ही, किसानों को परंपरागत खेती के साथ-साथ अन्न मिलेट्स (मोटे अनाज) की खेती को बढ़ावा देने की सलाह दी, ताकि उनकी आमदनी बढ़ सके।
डॉ. दीक्षा गौतम ने महिलाओं के लिए हल्के वजन वाले महिला-अनुकूल कृषि उपकरणों की आवश्यकता पर बल दिया। ऐसे उपकरणों से श्रम की तीव्रता कम होगी और उत्पादकता में वृद्धि होगी, जिससे महिलाओं का काम आसान होगा।
डॉ. प्रज्ञा ओझा ने पोषण सुरक्षा, जैविक सब्जी उत्पादन और परिवार की खाद्य विविधता बढ़ाने के लिए गृह वाटिका स्थापित करने के व्यावहारिक तरीकों की जानकारी दी। घर पर उगाई गई सब्जियां न केवल ताजी और पौष्टिक होती हैं, बल्कि परिवार की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने में भी सहायक होती हैं।
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डॉ. श्याम सिंह, अध्यक्ष कृषि विज्ञान केंद्र, ने जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच मोटे अनाजों, जैसे बाजरा, ज्वार, कोदो, कुटकी और रागी की उपयोगिता पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि ये फसलें कम पानी में भी अच्छी उपज देती हैं, जो बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। दलहन और तिलहन फसलों में कीट व रोग प्रबंधन के लिए रोग-प्रतिरोधी किस्मों के उपयोग की भी सलाह दी गई।
डॉ. प्रकाश ने प्राकृतिक खेती के लिए आवश्यक संसाधन, जैसे जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत और अन्य जैविक घोलों के निर्माण की तकनीकों का प्रदर्शन किया। उन्नत कृषि यंत्रों की आवश्यकता और उपयोगिता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि इससे लागत और समय दोनों की बचत होगी।
उन्नत मुर्गी पालन तकनीकी विषय पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए, जो ग्रामीण परिवारों के लिए कम लागत में आय और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायक हो सकते हैं। बांदा की सफल महिला उद्यमी अर्चना शुक्ला ने अपने उद्यम स्थापित करने से लेकर देश-विदेश तक व्यवसाय विस्तार की अपनी प्रेरणादायक कहानी साझा की।
महोबा की पारंपरिक देसवाड़ी पान उद्योग में क्रांति लाने के मिशन पर काम कर रहीं मयंकिता चौरसिया ने बताया कि देसावरी पान की जीआई टैगिंग से उन्हें नई ऊर्जा मिली है। उन्होंने पान मुखवास, पान गुलकंद, पान चॉकलेट और पान खजूर जैसे कई नए उत्पाद विकसित किए हैं, जो ग्राहकों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं।
अर्चना शुक्ला ने बताया कि अन्न (मिलेट्स) न केवल भोजन हैं, बल्कि औषधीय गुणों से भरपूर एक जीवनशैली हैं। ये जलवायु परिवर्तन के अनुकूल हैं और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने ग्रामीण महिलाओं को रोजगारपरक प्रशिक्षण देकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने पर भी जोर दिया।
प्रगतिशील कृषक जयराम सिंह ने बताया कि फाल्सा की खेती किसानों की आमदनी बढ़ाने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। उन्होंने फाल्सा जैसे फल की बागवानी और उसके नवीन प्रयोगों से अपनी आय को दोगुना किया है। प्रति एकड़ फाल्सा की खेती से वह प्रति वर्ष 25 से 30 लाख रुपये की आय प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने किसानों को परंपरागत कृषि से हटकर ऐसी लाभकारी खेती को अपनाने की सलाह दी।
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डॉ. दीक्षा गौतम ने महिलाओं के लिए हल्के वजन वाले महिला-अनुकूल कृषि उपकरणों की आवश्यकता पर बल दिया। ऐसे उपकरणों से श्रम की तीव्रता कम होगी और उत्पादकता में वृद्धि होगी, जिससे महिलाओं का काम आसान होगा।
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डॉ. प्रज्ञा ओझा ने पोषण सुरक्षा, जैविक सब्जी उत्पादन और परिवार की खाद्य विविधता बढ़ाने के लिए गृह वाटिका स्थापित करने के व्यावहारिक तरीकों की जानकारी दी। घर पर उगाई गई सब्जियां न केवल ताजी और पौष्टिक होती हैं, बल्कि परिवार की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने में भी सहायक होती हैं।
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डॉ. श्याम सिंह, अध्यक्ष कृषि विज्ञान केंद्र, ने जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच मोटे अनाजों, जैसे बाजरा, ज्वार, कोदो, कुटकी और रागी की उपयोगिता पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि ये फसलें कम पानी में भी अच्छी उपज देती हैं, जो बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। दलहन और तिलहन फसलों में कीट व रोग प्रबंधन के लिए रोग-प्रतिरोधी किस्मों के उपयोग की भी सलाह दी गई।
डॉ. प्रकाश ने प्राकृतिक खेती के लिए आवश्यक संसाधन, जैसे जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत और अन्य जैविक घोलों के निर्माण की तकनीकों का प्रदर्शन किया। उन्नत कृषि यंत्रों की आवश्यकता और उपयोगिता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि इससे लागत और समय दोनों की बचत होगी।
उन्नत मुर्गी पालन तकनीकी विषय पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए, जो ग्रामीण परिवारों के लिए कम लागत में आय और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायक हो सकते हैं। बांदा की सफल महिला उद्यमी अर्चना शुक्ला ने अपने उद्यम स्थापित करने से लेकर देश-विदेश तक व्यवसाय विस्तार की अपनी प्रेरणादायक कहानी साझा की।
महोबा की पारंपरिक देसवाड़ी पान उद्योग में क्रांति लाने के मिशन पर काम कर रहीं मयंकिता चौरसिया ने बताया कि देसावरी पान की जीआई टैगिंग से उन्हें नई ऊर्जा मिली है। उन्होंने पान मुखवास, पान गुलकंद, पान चॉकलेट और पान खजूर जैसे कई नए उत्पाद विकसित किए हैं, जो ग्राहकों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं।
अर्चना शुक्ला ने बताया कि अन्न (मिलेट्स) न केवल भोजन हैं, बल्कि औषधीय गुणों से भरपूर एक जीवनशैली हैं। ये जलवायु परिवर्तन के अनुकूल हैं और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने ग्रामीण महिलाओं को रोजगारपरक प्रशिक्षण देकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने पर भी जोर दिया।
प्रगतिशील कृषक जयराम सिंह ने बताया कि फाल्सा की खेती किसानों की आमदनी बढ़ाने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। उन्होंने फाल्सा जैसे फल की बागवानी और उसके नवीन प्रयोगों से अपनी आय को दोगुना किया है। प्रति एकड़ फाल्सा की खेती से वह प्रति वर्ष 25 से 30 लाख रुपये की आय प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने किसानों को परंपरागत कृषि से हटकर ऐसी लाभकारी खेती को अपनाने की सलाह दी।

फोटो- 17 किसान मेले के दूसरे दिन मंच में महिला शक्ति का रहा बोलबाला। संवाद- फोटो : रायबरेली में बछरावां थाना में डंपर मालिक और एआरटीओ से होती बहस।

फोटो- 17 किसान मेले के दूसरे दिन मंच में महिला शक्ति का रहा बोलबाला। संवाद- फोटो : रायबरेली में बछरावां थाना में डंपर मालिक और एआरटीओ से होती बहस।

फोटो- 17 किसान मेले के दूसरे दिन मंच में महिला शक्ति का रहा बोलबाला। संवाद- फोटो : रायबरेली में बछरावां थाना में डंपर मालिक और एआरटीओ से होती बहस।

फोटो- 17 किसान मेले के दूसरे दिन मंच में महिला शक्ति का रहा बोलबाला। संवाद- फोटो : रायबरेली में बछरावां थाना में डंपर मालिक और एआरटीओ से होती बहस।