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Banda News: तालाब पाटकर बना लिए मकान, अब बचा है सिर्फ नाम
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बांदा। जल संरक्षण और भूगर्भ जलस्तर बढ़ाने में तालाबों की भूमिका अहम होती है। इन्हीं तालाबों की वजह से जिले को राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हुआ। ग्रामीण इलाकों में तालाब तो खोदे जा रहे हैं, लेकिन शहर के तालाबों की सुध नहीं ली जा रही है।
शहर के 50 से ज्यादा तालाबों का अस्तित्व पूरी तरह मिट गया, जबकि तमाम तालाबों पर अवैध कब्जे हैं। सेढ़ू तलैया, डिग्गी और परशुराम तालाब पर मोहल्ले आबाद हो गए हैं। यहां बड़े-बड़े मकान बन गए हैं। पालिका में आज भी 64 से ज्यादा तालाब दर्ज हैं।
चार दशक पहले तक शहर में 100 से ज्यादा तालाब थे। धीरे-धीरे इन पर भूमाफिया की नजर पड़ी और कब्जे की होड़ लग गई। शहर के ज्यादातर तालाब पाटकर प्लाटिंग कर दी गई और मकान खड़े हो गए। प्रशासन और नगर पालिका मूकदर्शक बने रहे। करीब दस वर्ष से शहरीकरण में तेजी आई और भूमाफिया के निशाने पर बचे-खुचे तालाब आ गए।
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नगर पालिका के आंकड़ों में डिग्गी तालाब करीब चार हेक्टेयर दर्ज है, जबकि वहां तालाब का नामोनिशान नहीं है। कुछ हिस्से में रेलवे विभाग आबाद हो गया तो कुछ में शहरवासी काबिज हो गए। इसी तरह परशुराम तालाब कागजों में करीब छह हेक्टेयर है, लेकिन अब यहां तालाब का नामोनिशान नहीं है। मोहल्ला जरूर परशुराम तालाब के नाम से जाना जाता है।
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शहर के 50 से ज्यादा तालाबों का अस्तित्व पूरी तरह मिट गया, जबकि तमाम तालाबों पर अवैध कब्जे हैं। सेढ़ू तलैया, डिग्गी और परशुराम तालाब पर मोहल्ले आबाद हो गए हैं। यहां बड़े-बड़े मकान बन गए हैं। पालिका में आज भी 64 से ज्यादा तालाब दर्ज हैं।
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चार दशक पहले तक शहर में 100 से ज्यादा तालाब थे। धीरे-धीरे इन पर भूमाफिया की नजर पड़ी और कब्जे की होड़ लग गई। शहर के ज्यादातर तालाब पाटकर प्लाटिंग कर दी गई और मकान खड़े हो गए। प्रशासन और नगर पालिका मूकदर्शक बने रहे। करीब दस वर्ष से शहरीकरण में तेजी आई और भूमाफिया के निशाने पर बचे-खुचे तालाब आ गए।
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नगर पालिका के आंकड़ों में डिग्गी तालाब करीब चार हेक्टेयर दर्ज है, जबकि वहां तालाब का नामोनिशान नहीं है। कुछ हिस्से में रेलवे विभाग आबाद हो गया तो कुछ में शहरवासी काबिज हो गए। इसी तरह परशुराम तालाब कागजों में करीब छह हेक्टेयर है, लेकिन अब यहां तालाब का नामोनिशान नहीं है। मोहल्ला जरूर परशुराम तालाब के नाम से जाना जाता है।