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अजोला से दूर होगा हरे चारे का संकट

Mon, 02 Dec 2019 11:39 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Mon, 02 Dec 2019 11:39 PM IST
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Green fodder crisis will be overcome with Ajola
प्रगतिशील युवा किसान असलम खां। - फोटो : BANDA
बांदा। बुंदेलखंड में पशुओं का चारा सबसे बड़ी समस्या है। भूमि, पानी और वातावरण मुफीद न होने से पशुपालक और किसान चारा संकट से हमेशा जूझते रहते हैं, लेकिन यहां के एक प्रगतिशील युवा किसान ने ‘अजोला’ प्रजाति के चारे का उत्पादन किया है। यह मामूली लागत और कम समय में पैदा होने के साथ ही पोषकतत्वों से भरपूर है। इसका इस्तेमाल जैविक खाद के रूप में भी हो सकता है। यह दो साल से यहां पैदा हो रहा है।
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जिले के छनेहरा लालपुर (बड़ोखर ब्लाक) गांव में बुंदेलखंड जैविक कृषि फार्म संचालित कर रहे युवा किसान असलम खां ने अपने कृषि फार्म के एक बड़े हिस्से को अजोला चारा से हरा-भरा कर रखा है। उनका कहना है कि यह चारा पशुओं के भूसा/चारा में मिलाकर खिलाया जाता है। पशु बड़े चाव से खाते हैं। इससे दूध में वृद्धि होती है।
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मुर्गियां भी इसे पसंद करती हैं। इससे अंडा उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है। बताया कि अजोला चारा की पैदावार पूरे वर्ष होती है। यह छिछले (6 से 8 इंच) पानी में होता है। गड्ढे या पिट खोदकर उसमें पॉलिथिन बिछाकर पानी भर दिया जाता है। 4 से 6 दिन पुराना गोबर डाला जाता है। 12 से 15 दिन में अजोला तैयार हो जाता है। इसकी बुवाई केवल एक बार की जाती है। बचे हुए चारे से यह 15 दिन में तैयार हो जाता है।
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कई जिलों के किसान ले रहे हैं अजोला
बांदा। किसान असलम बताते हैं कि अजोला का प्रयोग हरी खाद की तरह भी होता है। इसके अलावा इन्हें मुर्गी, बत्तख, गाय, भैंस, बकरी को खिलाया जाता है। इसका बीज (मदर कल्चर) 200 रुपये प्रति किलो है। असलम के मुताबिक उनके कृषि फार्म से प्रयागराज, कानपुर, हमीरपुर, चित्रकूट तथा बांदा के किसान व पशुपालक अजोला चारा ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि थोड़ी सी मेहनत और प्रयास से अजोला चारा एक गड्ढे से रोजाना एक से दो किलो तक हासिल किया जा सकता है।
नेपियर घास भी पूरे साल उगाएं
बांदा। कम पानी और कम मेहनत से पशुओं के लिए एक और चारा घास तैयार किया जा सकता है। इसे नेपियर घास कहते हैं। प्रगतिशील किसान असलम खां बताते हैं कि उन्होंने अपने कृषि फार्म में दो वर्ष पूर्व यह घास लगाई थी। सभी मौसमों में यह उपलब्ध रहती है। मई-जून की भीषण गर्मी में भी हल्की सिंचाई से हरा चारा मिलता रहता है। एक बार लगा देने पर 8 से 10 वर्षों तक यह घास मिलती रहती है। अलबत्ता समय-समय पर गोबर की खाद, जीवामृत और पानी की जरूरत होती है।

कृषि विशेषज्ञ ने भी लगाई मुहर
बांदा। कृषि विश्वविद्यालय में सहायक अधिष्ठाता डा. बीके गुप्ता ने भी अजोला चारा को पशुओं के लिए उपयोगी बताया है। उन्होंने कहा कि यह पशुओं, मुर्गियों और मछलियों के लिए अच्छा चारा है। खेत में खाद के काम भी आता है। इसमें नाइट्रोजन भी पाया जाता है।

अजोला घास।

अजोला घास।- फोटो : BANDA

नेपियर घास।

नेपियर घास।- फोटो : BANDA

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