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कट गई टांग, फिर भी हौसले जवान
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
Updated Thu, 08 Oct 2015 12:31 AM IST
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बांदा। हिम्मते मरदा, मददे खुदा। 65 साल के किसान पर यह
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जुमला सटीक साबित हुआ है। करीब 40 साल पूर्व अपनी दाहिनी टांग गंवा चुका यह
किसान अपने को अपाहिज मानने को हरगिज तैयार नहीं है। कटी टांग के स्थान पर
वह लाठी बांधकर खेत की जुताई समेत रोजमर्रा के सारे काम निपटा रहा है।
विकलांगों को प्रेरणा देनी वाली यह हकीकत बबेरू क्षेत्र के पतवन गांव के छोटे से मजरे एमपी का पुरवा की है। यहां के देवराज यादव के पास मात्र चार बीघा जमीन है। वे बताते हैं कि करीब 40 वर्ष पूर्व खेत की जुताई करते समय बैल ने लात मार दी। इससे दाहिने पैर में गंभीर घाव हो गया।
उन्होंने घरेलू इलाज किया, पर घाव और बढ़ गया। अंतत: कानपुर में डाक्टरों ने दाहिना पैर जांघ के पास से काट दिया। तब से एक पैर से ही काम चला रहे हैं। विकलांगता उनके रोजमर्रा के कामों और खेती किसानी के कामों पर आड़े नहीं आ रही।
देवराज बताते हैं कि एक दिन खेत की मेड़ पर बैठकर सोच रहे थे कि एक पैर से खेती कैसे होगी? परिवार कैसे पलेगा? तभी दिमाग में एक उपाय सूझा। उन्होंने अपनी लाठी कटी टांग पर बांध लिया। हल का सहारा लेकर खेत में हल चलाने की कोशिश की।
हालांकि वह कई बार गिरे। चोटें भी आईं, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। आखिरकार उनकी कोशिश रंग लाई। अब वे लाठी बांधकर बिना गिरे-पड़े बखूबी हल चलाते हैं। मवेशियों को तालाब में ले जाकर पानी पिलाते हैं। इस काम में पत्नी रानी देवी पूरी मदद करती हैं।
कर्ज या परेशानियों से तंग आकर खुदकुशी की सोचने वाले किसानों को विकलांग देवराज से प्रेरणा लेनी चाहिए। देवराज यादव पर 25 हजार रुपया साहूकारों का कर्ज है। पांच रुपये सैकड़ा के हिसाब से हर माह 1250 रुपये ब्याज देते हैं।
500 रुपये पेंशन के अलावा गाढ़ी कमाई से शेष पैसा मिलाकर ब्याज की अदायगी करते हैं। मूलधन जस का तस है। इसके बाद भी देवराज का कहना है कि वे आत्महत्या जैसी बात नहीं सोचते।
देवराज लाठी हटाकर कृत्रिम पैर लगवाना नहीं चाहते। जयपुर (राजस्थान) में विकलांगों के लिए एनजीओ चलाने वाले उद्योगपति प्रेम भंडारी ने देवराज को कृत्रिम पैर लगाने का आफर दिया है। देवराज का कहना है कि कृत्रिम पैर लगाकर जरूर अपाहिज हो जाएंगे, क्योंकि कृत्रिम पैर बांधकर ऊबड़-खाबड़ खेत में हल नहीं चलाया जा सकता।
लाठी के वे आदी हो गए हैं। इससे बखूबी खेती कर रहे हैं। स्वयंसेवी आशीष सागर ने बताया कि उन्होंने फेसबुक पर देवराज की फोटो भेजी थी। उसी के बाद जयपुर से यह आफर आया था।
विकलांगों को प्रेरणा देनी वाली यह हकीकत बबेरू क्षेत्र के पतवन गांव के छोटे से मजरे एमपी का पुरवा की है। यहां के देवराज यादव के पास मात्र चार बीघा जमीन है। वे बताते हैं कि करीब 40 वर्ष पूर्व खेत की जुताई करते समय बैल ने लात मार दी। इससे दाहिने पैर में गंभीर घाव हो गया।
उन्होंने घरेलू इलाज किया, पर घाव और बढ़ गया। अंतत: कानपुर में डाक्टरों ने दाहिना पैर जांघ के पास से काट दिया। तब से एक पैर से ही काम चला रहे हैं। विकलांगता उनके रोजमर्रा के कामों और खेती किसानी के कामों पर आड़े नहीं आ रही।
देवराज बताते हैं कि एक दिन खेत की मेड़ पर बैठकर सोच रहे थे कि एक पैर से खेती कैसे होगी? परिवार कैसे पलेगा? तभी दिमाग में एक उपाय सूझा। उन्होंने अपनी लाठी कटी टांग पर बांध लिया। हल का सहारा लेकर खेत में हल चलाने की कोशिश की।
हालांकि वह कई बार गिरे। चोटें भी आईं, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। आखिरकार उनकी कोशिश रंग लाई। अब वे लाठी बांधकर बिना गिरे-पड़े बखूबी हल चलाते हैं। मवेशियों को तालाब में ले जाकर पानी पिलाते हैं। इस काम में पत्नी रानी देवी पूरी मदद करती हैं।
कर्ज या परेशानियों से तंग आकर खुदकुशी की सोचने वाले किसानों को विकलांग देवराज से प्रेरणा लेनी चाहिए। देवराज यादव पर 25 हजार रुपया साहूकारों का कर्ज है। पांच रुपये सैकड़ा के हिसाब से हर माह 1250 रुपये ब्याज देते हैं।
500 रुपये पेंशन के अलावा गाढ़ी कमाई से शेष पैसा मिलाकर ब्याज की अदायगी करते हैं। मूलधन जस का तस है। इसके बाद भी देवराज का कहना है कि वे आत्महत्या जैसी बात नहीं सोचते।
देवराज लाठी हटाकर कृत्रिम पैर लगवाना नहीं चाहते। जयपुर (राजस्थान) में विकलांगों के लिए एनजीओ चलाने वाले उद्योगपति प्रेम भंडारी ने देवराज को कृत्रिम पैर लगाने का आफर दिया है। देवराज का कहना है कि कृत्रिम पैर लगाकर जरूर अपाहिज हो जाएंगे, क्योंकि कृत्रिम पैर बांधकर ऊबड़-खाबड़ खेत में हल नहीं चलाया जा सकता।
लाठी के वे आदी हो गए हैं। इससे बखूबी खेती कर रहे हैं। स्वयंसेवी आशीष सागर ने बताया कि उन्होंने फेसबुक पर देवराज की फोटो भेजी थी। उसी के बाद जयपुर से यह आफर आया था।