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आटा- दाल के लिए दुकानदारों का मुंह ताकतें हैं मनरेगा मजदूर

Sat, 09 Apr 2016 11:52 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा Updated Sat, 09 Apr 2016 11:52 PM IST
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Ata- shoppers look towards rural laborers to pulse

बांदा- चित्रकूट- हमीरपुर। मनरेगा अब सिर्फ नाम की गारंटी दे रहा है। इसमें न तो काम की गारंटी है और न ही मजदूरी की। दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद शाम को आटा दाल के लिए दुकानदारों का मुंह ताकना पड़ता है।

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कोई बीमार हो जाए तो साहूकार से कर्जा लेने की विवशता है। ऐसे में बच्चों को शहर भेज दिया है। खुद इस उम्मीद में काम कर रहे हैं कि देर सबेर पिछला बकाया मिल जाएगा। यह कहना है हमीरपुर के -- गांव निवासी--। कुछ ऐसी ही हालत बुंदेलखंड के ज्यादातर किसानों की है। इन्हें काम के बाद मजदूरी के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है।   
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बुंदेलखंड (बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, महोबा, जालौन) में रोजगार की गारंटी देने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में वर्ष 2015-16 में 8,08,553 मजदूरों ने जॉब कार्ड के लिए आवेदन किया था।
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इनमें 7,89,341 मजदूरों को जॉब कार्ड जारी हुआ। इस तरह बुंदेलखंड में पंजीकृत कुल मजदूरों की तादाद 17,27,858 हो गई है। इसमें सिर्फ 5,85,760 (33 फीसदी) को ही काम मिला हैं। इतना ही नहीं जिन लोगों ने काम किया, उसमें करीब 17.81 करोड़ रुपया अभी भी मजदूरी बाकी है।


इसके लिए बजट का इंतजार किया जा रहा है। जबकि पिछले सत्र में बुंदेलखंड के पांच जिलों में मनरेगा पर दो अरब पांच करोड़ 75 लाख 58 हजार रुपये खर्च हुए हैं। समय पर मजदूरी न मिलने की वजह से अब मनरेगा से मजदूरों का मोहभंग हो रहा है।

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