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अर्थियों के अवशेषों से पटा केन नदी घाट
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बांदा। कोरोना महामारी में मौतों का ग्राफ कितना बढ़ गया है, इसका साफ संकेत केन नदी के घाट दे रहे हैं। बड़ी संख्या में रोजाना शवों को नदी में प्रवाहित किया जा रहा है। घाट पर अर्थियों के अवशेषों का ढेर लगा हुआ है। शहर से सटे गांवों के लोग यहां आकर केन नदी में शवों को प्रवाहित कर रहे हैं।
पंचायत चुनाव के बाद कोरोना ने गांवों में कोहराम मचा रखा है। बड़ी संख्या में गांवों में लोग बीमार हैं। खौफ के चलते अपनी कोविड जांच भी नहीं करा रहे हैं। सरकारी व प्राइवेट अस्पतालों की ओपीडी बंद होने से गांवों में झोलाछाप डाक्टरों से इलाज करा रहे हैं। झोलाछाप भी अंधेरे में तीर चलाते हुए मरीजों को दवाएं दे रहे हैं। समय पर सही इलाज न मिलने से ग्रामीण दम तोड़ रहे हैं। पिछले कई माह से कोरोना के चलते प्रतिदिन बड़ी संख्या में मौतें हो रही हैं। अधिकांश का दाह संस्कार मुक्तिधाम स्थित इलेक्ट्रिक शवदाह गृह में होता रहा है। लगातार इस्तेमाल से शवदाह गृह भी जवाब दे गया है। हीटर कमजोर होने से एक शव के अंतिम संस्कार में दो से तीन घंटे लग रहे हैं।
बड़ी तादाद में शवों को इसी परिसर में चिता बनाकर दाह संस्कार किया जा रहा है। यहां के अलावा तमाम शव केन नदी भूरागढ़ के पास स्थित राजघाट व हरदौली घाटों में प्रवाहित किए जा रहे हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नदी के घाटों पर अर्थियों की जगह-जगह सामग्री पड़ी है। नगर पालिका नियमित रूप से यहां सफाई नहीं करा रही। अर्थियों के अवशेष साफ संकेत दे रहे हैं कि कितने ज्यादा शव यहां प्रवाहित किए जा रहे हैं। अक्सर कुछ शव पानी के ऊपर उतरा भी आते हैं। हालांकि, अभी ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि शव को पानी से निकालकर दफन आदि कर पुन: निस्तारित किया गया हो।
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पंचायत चुनाव के बाद कोरोना ने गांवों में कोहराम मचा रखा है। बड़ी संख्या में गांवों में लोग बीमार हैं। खौफ के चलते अपनी कोविड जांच भी नहीं करा रहे हैं। सरकारी व प्राइवेट अस्पतालों की ओपीडी बंद होने से गांवों में झोलाछाप डाक्टरों से इलाज करा रहे हैं। झोलाछाप भी अंधेरे में तीर चलाते हुए मरीजों को दवाएं दे रहे हैं। समय पर सही इलाज न मिलने से ग्रामीण दम तोड़ रहे हैं। पिछले कई माह से कोरोना के चलते प्रतिदिन बड़ी संख्या में मौतें हो रही हैं। अधिकांश का दाह संस्कार मुक्तिधाम स्थित इलेक्ट्रिक शवदाह गृह में होता रहा है। लगातार इस्तेमाल से शवदाह गृह भी जवाब दे गया है। हीटर कमजोर होने से एक शव के अंतिम संस्कार में दो से तीन घंटे लग रहे हैं।
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बड़ी तादाद में शवों को इसी परिसर में चिता बनाकर दाह संस्कार किया जा रहा है। यहां के अलावा तमाम शव केन नदी भूरागढ़ के पास स्थित राजघाट व हरदौली घाटों में प्रवाहित किए जा रहे हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नदी के घाटों पर अर्थियों की जगह-जगह सामग्री पड़ी है। नगर पालिका नियमित रूप से यहां सफाई नहीं करा रही। अर्थियों के अवशेष साफ संकेत दे रहे हैं कि कितने ज्यादा शव यहां प्रवाहित किए जा रहे हैं। अक्सर कुछ शव पानी के ऊपर उतरा भी आते हैं। हालांकि, अभी ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि शव को पानी से निकालकर दफन आदि कर पुन: निस्तारित किया गया हो।
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