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फोटो 13 बीएनडी पी-1 : खेतों में फसल का जायजा लेते कृषि वैज्ञानिक डा.जितेंद्र सिंह।
Updated Tue, 13 Mar 2018 10:44 PM IST
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फोटो 13 बीएनडी पी-1 : खेतों में फसल का जायजा लेते कृषि वैज्ञानिक डा.जितेंद्र सिंह।
अन्ना जानवरों की दहशत, नहीं बोते चना और अरहर
अरहर में फली छेदक सूंड़ी और मसूर में माहू की मार
कृषि वैज्ञानिक ने कई गांवों का भ्रमण कर लिया जायजा
अमर उजाला ब्यूरो
बांदा। चित्रकूटधाम मंडल में अन्ना जानवरों से परेशान किसानों का चना और अरहर की बुआई में रुझान घट रहा है। उधर, मौजूदा मौसम में अरहर को फली छेदक सूंड़ी और मसूर में माहू कीट ने काफी नुकसान पहुंचाया है। चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय, प्रसार निदेशालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. जितेंद्र सिंह ने चार दिवसीय भ्रमण में किसानों को खेती की तकनीकी जानकारी दीं।
डॉ. जितेंद्र ने बताया कि हाल ही में उन्होंने बांदा जिले के बबेरू, कमासिन, बिसंडा आदि ब्लाकों के विभिन्न गांवों में किसानों से बातचीत की। किसानों ने सबसे ज्यादा नुकसान अन्ना जानवरों से बताया है। इससे परेशान किसानों ने अब चना और अरहर की बुआई कम कर दी है। इन क्षेत्रों में फली छेदक सूंड़ी ने 50 प्रतिशत तक फसल बर्बाद की है। इसके अलावा मसूर में माहू कीट ने क्षति पहुंचाई है। कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि वर्षा आधारित खेती में बहुत पतली मेड़ वाले खेत ज्यादा पाए जाते हैं। खेत समतल नहीं होते है और कार्बनिक पदार्थ की कमी होती है। पहली और दूसरी बारिश में मिट्टी के साथ पोषक तत्व भी बह जाते हैं। उन्होंने कहा कि पानी पाताल का हो या वर्षा का उसके प्रबंधन और उपयोग तकनीक पर जागरूकता जरूरी है। धान, गेहूं फसल चक्र के प्रभावी हो जाने से दलहनी और तिलहनी फसलें कम बोई जाने लगती हैं। किसान अगर जेएस माडल की तकनीक अपना कर जल संचयन करें तो लाभकारी और टिकाऊ खेती कर सकते हैं।
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अन्ना जानवरों की दहशत, नहीं बोते चना और अरहर
अरहर में फली छेदक सूंड़ी और मसूर में माहू की मार
कृषि वैज्ञानिक ने कई गांवों का भ्रमण कर लिया जायजा
अमर उजाला ब्यूरो
बांदा। चित्रकूटधाम मंडल में अन्ना जानवरों से परेशान किसानों का चना और अरहर की बुआई में रुझान घट रहा है। उधर, मौजूदा मौसम में अरहर को फली छेदक सूंड़ी और मसूर में माहू कीट ने काफी नुकसान पहुंचाया है। चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय, प्रसार निदेशालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. जितेंद्र सिंह ने चार दिवसीय भ्रमण में किसानों को खेती की तकनीकी जानकारी दीं।
डॉ. जितेंद्र ने बताया कि हाल ही में उन्होंने बांदा जिले के बबेरू, कमासिन, बिसंडा आदि ब्लाकों के विभिन्न गांवों में किसानों से बातचीत की। किसानों ने सबसे ज्यादा नुकसान अन्ना जानवरों से बताया है। इससे परेशान किसानों ने अब चना और अरहर की बुआई कम कर दी है। इन क्षेत्रों में फली छेदक सूंड़ी ने 50 प्रतिशत तक फसल बर्बाद की है। इसके अलावा मसूर में माहू कीट ने क्षति पहुंचाई है। कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि वर्षा आधारित खेती में बहुत पतली मेड़ वाले खेत ज्यादा पाए जाते हैं। खेत समतल नहीं होते है और कार्बनिक पदार्थ की कमी होती है। पहली और दूसरी बारिश में मिट्टी के साथ पोषक तत्व भी बह जाते हैं। उन्होंने कहा कि पानी पाताल का हो या वर्षा का उसके प्रबंधन और उपयोग तकनीक पर जागरूकता जरूरी है। धान, गेहूं फसल चक्र के प्रभावी हो जाने से दलहनी और तिलहनी फसलें कम बोई जाने लगती हैं। किसान अगर जेएस माडल की तकनीक अपना कर जल संचयन करें तो लाभकारी और टिकाऊ खेती कर सकते हैं।
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