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बेबस आंखों से अपनी बर्बादी देख रहे किसान

Sun, 09 Aug 2020 09:51 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sun, 09 Aug 2020 09:51 PM IST
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Farmers watching their waste with helpless eyes
बलरामपुर के लालनगर विरदा गांव के पास राप्ती नदी से कट रही किसानों की जमीन - फोटो : BALRAMPUR
बलरामपुर। सात दशकों से राप्ती नदी तटवर्ती गांवों के किसानों के खेत व मकान लगातार तबाह कर रही है। नदी की तबाही रोकने के हर साल दावे तो बहुत किए जाते हैं लेकिन अंत में बांस के कैरेट व चंद बालू भरी बोरियां ही जख्मों पर मरहम लगाने के लिए कटान रोकने के लिए डाली जाती हैं। हां ये बात अलग है कि फ्लड फाइटिंग के नाम पर हर साल कागजों में करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा जरूर हो जाता है। इन पीड़ितों को स्थाई राहत कब मिलेगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
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नेपाल के पहाड़ों से निकलकर जिले में बहने वाली प्रमुख नदी राप्ती बरसात के मौसम में बहुत खतरनाक हो जाती है। नदी की धारा कब किस तरफ कटान शुरू कर देगी ये बात आज तक कोई समझ नहीं पाया। इस साल नदी की कटान भारी तबाही मचा रही है। कल्यानपुर, सहिबानगर, चरनगहिया, लालनगर विरदा, लालाजोत, गोनकोट, रामनगर, जबदहा, जबदही व सेमरहना सहित कई गांवों में कटान का कहर जारी है। प्रशासन ने भी करीब डेढ़ दर्जन स्थानों को कटान का प्रमुख केंद्र माना है। आलम ये है कि सभी प्रयासों के बाद नदी ने अब तक करीब 60 लोगों को बेघर कर दिया है। इसके अलावा अब तक किसानों की करीब तीन सौ बीघे खेती की जमीन भी बर्बाद हो गई है। यही नहीं ढोढरी से जमालीजोत जाने वाली सड़क भी कटान की चपेट में आकर तबाह हो गई है। लगभग एक हजार लोगों का गांव से बाहर जाने का रास्ता ही बंद हो गया है।
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समय से नहीं होता काम
बाढ़ की तबाही रोकने के लिए हर साल करोड़ों रुपये का प्लान तो तैयार किया जाता है लेकिन बरसात से पहले न तो बजट मिलता है और न ही कोई काम होता है। बारिश शुरू होने के बाद कटान होने पर बाढ़ खंड के अधिकारी प्रभावित स्थलों पर बांस के कैरेट या बालू की कुछ बोरियां डालकर अपने काम की इतिश्री कर देते हैं। बारिश के बाद फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है।
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हो रहा है काम
राप्ती के कटान वाले स्थलों को चिह्नित कर कटान रोकने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है। पीड़ितों की क्षति का आंकलन कराकर उन्हें उचित मुआवजा भी दिलाया जाएगा। -कृष्णा करुणेश, डीएम
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