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मजबूर हैं, क्योंकि हम मजदूर हैं
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बैरिया। हम 60 दिन क्या कई माह भी राजस्थान व दिल्ली, मुम्बई में रूक जाते अगर हमें खाने के लिए राशन-पानी मिला होता। सरकारी कैंप केवल दिखावा है, आधा पेट खाकर किसी तरह दिन काटे। वहां पुलिस वालों ने खूब मारा, अब वहां जाना बहुत मुश्किल है। इससे तंग आकर खोली के सारे सामानों को बेचकर किराए पर ट्रक लेकर घर की ओर चल दिए। ट्रक वाले बैरिया में ही उतार दिया क्योंकि किराया बैरिया तक ही तय था।
बिहार के पूर्णिया निवासी आशीष बिंद ने बताया कि मुंबई के बांद्रा इलाके में रहकर निर्माण कार्य में मजदूर का काम करते थ। उनके साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के लगभग 600 मजदूर उनके इलाके में रहते थे। उनके साथ रहने वाले शम्भू, दिनेश, सरल आदि ने बताया कि लॉकडाउन में हम मजदूरों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत राशन-पानी की हो गई। जेब की जमा-पूंजी सब खत्म हो गई और मुम्बई का राशन कार्ड भी नहीं है कि सरकारी राशन मिल पाए। सरकारी कैम्प में कहीं-कहीं बना बनाया खाना मिलता था जो हमारे इलाके से बहुत दूर था और जाने पर रास्ते में पुलिस वाले मारते थे। हम लोग आधे पेट ही खाना खा रहे थे। कोरोना से मरने से पहले हो सकता था कि हम लोग भूखमरी से ही मर जाएं। ऐसे में खोली का सारा सामान बेच कर किराए पर ट्रक लिया और गांव के लिए चल पड़े। इसी तरह दिल्ली एनसीआर में रहने वाले बिहार के कटिहार निवासी हेमंत, मानेसर में रहने वाले सुरेश, नोएडा के हरौला में रहने वाले एहसान, दिल्ली के सदर बाजार मंडी में रहने वाले विकास यादव और सूरत की मशहूर हीरा मंडी के पास रहने वाले आत्माराम की है। बताया कि अब पेट को पालना तक मुकिश्ल हो गया था लिहाजा जो भी सामान था बेच दिया और ट्रक का किराया जुटाया।
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बिहार के पूर्णिया निवासी आशीष बिंद ने बताया कि मुंबई के बांद्रा इलाके में रहकर निर्माण कार्य में मजदूर का काम करते थ। उनके साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के लगभग 600 मजदूर उनके इलाके में रहते थे। उनके साथ रहने वाले शम्भू, दिनेश, सरल आदि ने बताया कि लॉकडाउन में हम मजदूरों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत राशन-पानी की हो गई। जेब की जमा-पूंजी सब खत्म हो गई और मुम्बई का राशन कार्ड भी नहीं है कि सरकारी राशन मिल पाए। सरकारी कैम्प में कहीं-कहीं बना बनाया खाना मिलता था जो हमारे इलाके से बहुत दूर था और जाने पर रास्ते में पुलिस वाले मारते थे। हम लोग आधे पेट ही खाना खा रहे थे। कोरोना से मरने से पहले हो सकता था कि हम लोग भूखमरी से ही मर जाएं। ऐसे में खोली का सारा सामान बेच कर किराए पर ट्रक लिया और गांव के लिए चल पड़े। इसी तरह दिल्ली एनसीआर में रहने वाले बिहार के कटिहार निवासी हेमंत, मानेसर में रहने वाले सुरेश, नोएडा के हरौला में रहने वाले एहसान, दिल्ली के सदर बाजार मंडी में रहने वाले विकास यादव और सूरत की मशहूर हीरा मंडी के पास रहने वाले आत्माराम की है। बताया कि अब पेट को पालना तक मुकिश्ल हो गया था लिहाजा जो भी सामान था बेच दिया और ट्रक का किराया जुटाया।
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