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मंत्रियों की बर्खास्तगी से सियासी भूचाल
ब्यूरो/ अमर उजाला/ अखिलानंद तिवारी
Updated Thu, 29 Oct 2015 11:30 PM IST
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प्रदेश सरकार के दो कैबिनेट मंत्री अंबिका चौधरी और नारद राय की बर्खास्तगी की खबर गुरुवार को जिले में पहुंचते ही राजनीतिक भूचाल आ गया। कार्रवाई से कोई दुखी तो कोई खुश है। अब इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक नफा-नुकसान पर बहस शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी में दोनों मंत्री कद्दावर नेता की पहचान रखते हैं, लेकिन हाल की घटनाओं से दोनों खेमों के कार्यकर्ताओं में नाराजगी थी।
नारद राय को भूमिहार समाज का प्रतिनिधि माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लोकसभा चुनाव में नीरज शेखर की हार और भाजपा की जीत ने भूमिहार मतों की भूमिका में नारद राय के खिलाफ माहौल बनाने की नींव रखी थी। अंबिका चौधरी लगातार चार बार विधायक रहने के बाद पिछला विधानसभा चुनाव हारे थे।
पार्टी ने उन्हें न केवल विधानपरिषद का सदस्य, बल्कि राजस्व मंत्री भी बनाया था, लेकिन जिस तरह से उनके पर कतर कर पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री का ओहदा दिया गया, उससे अनुमान लगाया जा रहा था कि आलाकमान की निगाह टेढ़ी है।
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राजनीतिक गलियारों में हो रही चर्चा में नारद राय की बर्खास्तगी के लिए लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार तथा हाल में नगरपालिका में चेयरमैन प्रतिनिधि के साथ घटी घटनाओं को केंद्र बिंदु माना जा रहा है। जबकि अंबिका चौधरी के मामले में नवनियुक्त जिलाध्यक्ष संग्राम सिंह यादव को केंद्र में रखकर अटकलें लगाई जा रही है।
गौरतलब है कि विस चुनाव में अंबिका चौधरी की हार में संग्राम सिंह यादव के मतों की अहम भूमिका मानी गई थी। राजनीति के जानकारों का कहना है कि इस कार्रवाई से चाहे जिसका फायदा हो, चाहे जिसका कद बढ़े-घटे, लेकिन यह तय है कि इससे जिले की न केवल सपा बल्कि भाजपा, बसपा और कांग्रेस जैसे दलों के लिए नए समीकरण बनेंगे।
कयास लगाया जा रहा है कि इसका सबसे अधिक नुकसान सपा को भुगतना पड़ सकता है। देखना है कि पार्टी के नुकसान की भरपाई के लिए सपा नेतृत्व कौन सा कदम उठाता है
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नारद राय को भूमिहार समाज का प्रतिनिधि माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लोकसभा चुनाव में नीरज शेखर की हार और भाजपा की जीत ने भूमिहार मतों की भूमिका में नारद राय के खिलाफ माहौल बनाने की नींव रखी थी। अंबिका चौधरी लगातार चार बार विधायक रहने के बाद पिछला विधानसभा चुनाव हारे थे।
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पार्टी ने उन्हें न केवल विधानपरिषद का सदस्य, बल्कि राजस्व मंत्री भी बनाया था, लेकिन जिस तरह से उनके पर कतर कर पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री का ओहदा दिया गया, उससे अनुमान लगाया जा रहा था कि आलाकमान की निगाह टेढ़ी है।
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राजनीतिक गलियारों में हो रही चर्चा में नारद राय की बर्खास्तगी के लिए लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार तथा हाल में नगरपालिका में चेयरमैन प्रतिनिधि के साथ घटी घटनाओं को केंद्र बिंदु माना जा रहा है। जबकि अंबिका चौधरी के मामले में नवनियुक्त जिलाध्यक्ष संग्राम सिंह यादव को केंद्र में रखकर अटकलें लगाई जा रही है।
गौरतलब है कि विस चुनाव में अंबिका चौधरी की हार में संग्राम सिंह यादव के मतों की अहम भूमिका मानी गई थी। राजनीति के जानकारों का कहना है कि इस कार्रवाई से चाहे जिसका फायदा हो, चाहे जिसका कद बढ़े-घटे, लेकिन यह तय है कि इससे जिले की न केवल सपा बल्कि भाजपा, बसपा और कांग्रेस जैसे दलों के लिए नए समीकरण बनेंगे।
कयास लगाया जा रहा है कि इसका सबसे अधिक नुकसान सपा को भुगतना पड़ सकता है। देखना है कि पार्टी के नुकसान की भरपाई के लिए सपा नेतृत्व कौन सा कदम उठाता है