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रमाशंकर के शहीद होने के बाद गांव में सियापा
ब्यूरो,अमर उजाला,बलिया
Updated Tue, 01 Nov 2016 07:55 PM IST
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मध्य प्रदेश के जेल पुलिस रमाशंकर यादव के शहीद होने की सूचना के बाद दरवाजे पर मातम मनाते पट्टीदार।
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रमाशंकर यादव के छोटे भाई राजकुमार यादव जो गांव में ही रहकर किराने की दूकान चलाते हैं। सोमवार को सुबह जैसे ही अपने भाई की मौत की सूचना मिली वह दहाड़े मारकर रोने लगे। जिसे देख आसपास के लोग इक_ा हो गए। धीरे-धीरे यह बात पूरे क्षेत्र में फैल गई। लोग जानकारी लेने के लिए व्याकुल दिखे। नम आंखों से राजकुमार ने बताया कि परिवार के साथ भोपाल में बुचिया की शादी में शामिल होने की तैयारी चल रही थी। खुशी की जगह मातम छा गया।
आसमान टूट पड़ा, पूरे गांव में सियापा पसरा गया। गांव के प्रधान नरेंद्र सिंह ने बताया कि साल में दो-चार दिन के लिए गांव आते थे और सबसे मिलना-जुलना रहता था। उसकी मौत से गांववासी स्तब्ध है। रमाशंकर काफी मिलनसार स्वभाव के थे। सबकी कुशलक्षेम लेने की इच्छा उनके मन में हमेशा रहती थी। कभी कभी फोन करके हाल-चाल पूछते थे। उसी गांव के डा. रवींद्र यादव ने बताया कि वे गांव जब भी आते थे। बुजुर्गों के साथ तो बैठते ही थे।
लेकिन जब युवाओं को देखते थे तो दौडने, खेलने, कूदने की नसीहत हमेशा देते थे। वह चाहते थे कि जैसे उनके दोनों लड़के आर्मी में गए। उसी तरह से गांव के अन्य युवाओं को भी प्रेरित करते थे। इधर-उधर गांव में घूमने वाले को हमेशा कत्र्तव्य का पाठ पढ़ाया करते थे। उनके न रहने से गांव में शोक तो है ही। खासकर युवाओं में उन आतंकवादियों के प्रति काफी नाराजगी है। भले ही वह लोग आठों मार दिए गए। लेकिन गांव में सब यह जानने को आतुर है कि क्या कोई आतंकवादियों की रस्सी पकडने वाला था। कहां से उसे हथियार उपलब्ध हुआ। कौन इसके पीछे साजिशकर्ता है, यह जानने को सभी लोग बेताब है।
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आसमान टूट पड़ा, पूरे गांव में सियापा पसरा गया। गांव के प्रधान नरेंद्र सिंह ने बताया कि साल में दो-चार दिन के लिए गांव आते थे और सबसे मिलना-जुलना रहता था। उसकी मौत से गांववासी स्तब्ध है। रमाशंकर काफी मिलनसार स्वभाव के थे। सबकी कुशलक्षेम लेने की इच्छा उनके मन में हमेशा रहती थी। कभी कभी फोन करके हाल-चाल पूछते थे। उसी गांव के डा. रवींद्र यादव ने बताया कि वे गांव जब भी आते थे। बुजुर्गों के साथ तो बैठते ही थे।
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लेकिन जब युवाओं को देखते थे तो दौडने, खेलने, कूदने की नसीहत हमेशा देते थे। वह चाहते थे कि जैसे उनके दोनों लड़के आर्मी में गए। उसी तरह से गांव के अन्य युवाओं को भी प्रेरित करते थे। इधर-उधर गांव में घूमने वाले को हमेशा कत्र्तव्य का पाठ पढ़ाया करते थे। उनके न रहने से गांव में शोक तो है ही। खासकर युवाओं में उन आतंकवादियों के प्रति काफी नाराजगी है। भले ही वह लोग आठों मार दिए गए। लेकिन गांव में सब यह जानने को आतुर है कि क्या कोई आतंकवादियों की रस्सी पकडने वाला था। कहां से उसे हथियार उपलब्ध हुआ। कौन इसके पीछे साजिशकर्ता है, यह जानने को सभी लोग बेताब है।
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