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कोरोना काल में कम हुआ प्रदूषण
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बलिया। विश्व पृथ्वी दिवस हर साल 22 अप्रैल को मनाया जाता है लेकिन इस बार यह दिवस तब पड़ा है जब देश के अलावा कई देशों में कोराना कोरोना का कहर जारी है। कोरोना काल में लॉकडाउन के चलते लोग घरों में कैद हैं। कल कारखाने बंद हैं। सड़कों पर वाहन भी इक्के दुक्के चल रहे हैं। इसका परिणाम यह रहा है कि पर्यावरण के साथ ही नदियों का जल भी स्वच्छ हुआ है।
औद्योगिक इकाइयों के बंद होने से केमिकल युक्त दूषित पदार्थ नदियों में प्रवाहित ना होने से गंगा और घाघरा सहित विश्व के अधिकांश नदियों का जल स्वच्छ हो चुका है। झीलों का पानी भी मनोहारी व पारदर्शी हो चुका है। नदियों में जल जीव दिखाई देने लगे हैं, जबकि लाखों रुपये खर्च करके भी स्वच्छता कार्यक्रम के बावजूद ऐसा परिणाम नहीं निकला। बाग- बगीचे चिड़ियों के कलरव से गूंज रहे हैं। बड़े-बड़े शहरों में लोग घड़ी के अलार्म सुनकर जगते थे, परंतु वहां अब चिड़ियों के कोलाहल से लोग उठने लगे हैं। जंगलों में पर्याप्त आश्रय को तरसते जानवर सड़कों पर खुलेआम विचरण करते नजर आ रहे हैं। स्वच्छता को लेकर वर्षों का रिकार्ड टूटा है। निश्चित रूप से पर्यावरण शुद्ध हुआ है। लॉकडाउन के चलते लोगों की जीवन शैली भी बदली है। फास्ट फूड व विलासिता पूर्ण जीवन पर कुछ हद तक विराम लगा है। अनावश्यक खर्च बंद हुए हैं। परोपकार की भावनाएं जगी हैं। एकजुटता आई है। स्वास्थ्य व स्वच्छता के प्रति लोग गंभीर हुए हैं। घातक जैविक हथियार के परीक्षण का परिणाम लोगों को अब समझ में आ रहा है। पुरानी स्वस्थ परंपराएं याद आ रही हैं। आने वाले दिनों में भी इसकी याद रहेगी और लोग सतर्क रहेंगे। यह एक सकारात्मक संकेत है।
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दुनिया भर के वैज्ञानिकों व पर्यावरण विदों का मानना है कि लॉकडाउन खुलने के बाद भी हमें इसी प्रकार प्रकृति का ख्याल रखना होगा। क्योंकि हमारा वजूद भी कुदरत पर ही टिका है। आइए हम कुदरत के असली रूप को संवारने का संकल्प लें ताकि मानव जाति बरकरार रहे।-डॉ. नवचंद्र तिवारी, शिक्षक, सामाजिक विज्ञान
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औद्योगिक इकाइयों के बंद होने से केमिकल युक्त दूषित पदार्थ नदियों में प्रवाहित ना होने से गंगा और घाघरा सहित विश्व के अधिकांश नदियों का जल स्वच्छ हो चुका है। झीलों का पानी भी मनोहारी व पारदर्शी हो चुका है। नदियों में जल जीव दिखाई देने लगे हैं, जबकि लाखों रुपये खर्च करके भी स्वच्छता कार्यक्रम के बावजूद ऐसा परिणाम नहीं निकला। बाग- बगीचे चिड़ियों के कलरव से गूंज रहे हैं। बड़े-बड़े शहरों में लोग घड़ी के अलार्म सुनकर जगते थे, परंतु वहां अब चिड़ियों के कोलाहल से लोग उठने लगे हैं। जंगलों में पर्याप्त आश्रय को तरसते जानवर सड़कों पर खुलेआम विचरण करते नजर आ रहे हैं। स्वच्छता को लेकर वर्षों का रिकार्ड टूटा है। निश्चित रूप से पर्यावरण शुद्ध हुआ है। लॉकडाउन के चलते लोगों की जीवन शैली भी बदली है। फास्ट फूड व विलासिता पूर्ण जीवन पर कुछ हद तक विराम लगा है। अनावश्यक खर्च बंद हुए हैं। परोपकार की भावनाएं जगी हैं। एकजुटता आई है। स्वास्थ्य व स्वच्छता के प्रति लोग गंभीर हुए हैं। घातक जैविक हथियार के परीक्षण का परिणाम लोगों को अब समझ में आ रहा है। पुरानी स्वस्थ परंपराएं याद आ रही हैं। आने वाले दिनों में भी इसकी याद रहेगी और लोग सतर्क रहेंगे। यह एक सकारात्मक संकेत है।
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दुनिया भर के वैज्ञानिकों व पर्यावरण विदों का मानना है कि लॉकडाउन खुलने के बाद भी हमें इसी प्रकार प्रकृति का ख्याल रखना होगा। क्योंकि हमारा वजूद भी कुदरत पर ही टिका है। आइए हम कुदरत के असली रूप को संवारने का संकल्प लें ताकि मानव जाति बरकरार रहे।-डॉ. नवचंद्र तिवारी, शिक्षक, सामाजिक विज्ञान
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