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धूमधाम से निकली मां काली की शोभायात्रा
ballia
Updated Fri, 04 Aug 2017 10:14 PM IST
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नगर में निकाली गई मां काली की पूजा के पहले की झांकी।
- फोटो : ballia
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श्रावण शुक्ल पक्ष में होने वाली परंपरागत काली पूजा शुक्रवार को शोभायात्रा के साथ शुरू हुई। नगर के विभिन्न कमेटियों द्वारा शोभायात्रा निकाली गई। इस दौरान हाथी, घोड़े, ऊंट जहां जुलूस का शोभा बढ़ा रहे थे वहीं युवा भी डीजे की धुन पर थिरक रहे थे। जनपद के लगभग सभी गांवों में शुक्रवार को काली पूजा की धूम रही।
मान्यता है कि श्रावण शुक्ल पक्ष में काली मां के शक्ति पूजा की परंपरा डीह, शायर की पूजा से निकली है । इन दिनों में मवेशियों और मनुष्यों में फैलने वाली बीमारियों से रक्षा के लिए भोजपुरिया इलाके में गुनी, ओझा, सोखा, मांत्रिक , तांत्रिको द्वारा बहरवार की पूजा कराने की प्राचीन परम्परा है । अध्यात्म तत्ववेत्ता शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने बताया कि यह सांस्कृतिक परम्पराएं हैं । जिसमें महिलाएं पकवान बनाकर काली मॉ के निकट के मंदिर में पूजा करने जाती है ।
कालान्तर में इसमें शोभायात्रा निकालने की परंपरा महावीर घाट काली मंदिर के पुजारी ने 1970 में प्रारंभ किया। उसके बाद बालेश्वर मंदिर चौराहे के काली मंदिर से स्व. पन्नालाल दलाल ने जुलूस निकाला । इसके थोडे़ ही दिनों बाद मिड्ढी काली मंदिर से जुलूस निकलने लगा।
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कौशिकेय ने कहा कि पूर्वकाल की काली पूजा में खस्सी (बकरी के बच्चें ) और छौने ( सूअर के बच्चों ) और कबूतर के जोडे़ की बलि दी जाती थी और पडवा, सांड़ को कनकट्टा कर छोडा जाता था। लेकिन वर्तमान में खस्सी , छौना , पडवें को कान काटकर कनकट्टा करके छोड दिया जाता है और कबूतर और मुर्गा को सिंदूर लगाकर उड़ा दिया जाता है ।
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मान्यता है कि श्रावण शुक्ल पक्ष में काली मां के शक्ति पूजा की परंपरा डीह, शायर की पूजा से निकली है । इन दिनों में मवेशियों और मनुष्यों में फैलने वाली बीमारियों से रक्षा के लिए भोजपुरिया इलाके में गुनी, ओझा, सोखा, मांत्रिक , तांत्रिको द्वारा बहरवार की पूजा कराने की प्राचीन परम्परा है । अध्यात्म तत्ववेत्ता शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने बताया कि यह सांस्कृतिक परम्पराएं हैं । जिसमें महिलाएं पकवान बनाकर काली मॉ के निकट के मंदिर में पूजा करने जाती है ।
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कालान्तर में इसमें शोभायात्रा निकालने की परंपरा महावीर घाट काली मंदिर के पुजारी ने 1970 में प्रारंभ किया। उसके बाद बालेश्वर मंदिर चौराहे के काली मंदिर से स्व. पन्नालाल दलाल ने जुलूस निकाला । इसके थोडे़ ही दिनों बाद मिड्ढी काली मंदिर से जुलूस निकलने लगा।
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कौशिकेय ने कहा कि पूर्वकाल की काली पूजा में खस्सी (बकरी के बच्चें ) और छौने ( सूअर के बच्चों ) और कबूतर के जोडे़ की बलि दी जाती थी और पडवा, सांड़ को कनकट्टा कर छोडा जाता था। लेकिन वर्तमान में खस्सी , छौना , पडवें को कान काटकर कनकट्टा करके छोड दिया जाता है और कबूतर और मुर्गा को सिंदूर लगाकर उड़ा दिया जाता है ।