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अब जाने कहां गई वो सावन की कजरी

Mon, 10 Jul 2017 11:07 PM IST
Updated Mon, 10 Jul 2017 11:07 PM IST
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अब जाने कहां गई वो सावन की कजरी
सुखपुरा। अगर सावन का संबंध फुहारों से है तो कजरी का संबंध भी सावन से ही है। हमारे समाज में अलग अलग मौसम और उत्सव के लिए तमाम लोकगीत गाए जाते हैं। सावन में कजरी उसमें से एक है। जिसे महिलाएं अपने बुजुर्ग महिलाओं से सीखती हैं। सावन का जिक्र आते ही कजरी की याद बरबस आ जाती है। लेकिन आज आधुनिकता की चकाचौंध में यह विधा कमजोर पड़ रही है।
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लोकविधा पर पुस्तक लिख चुके उत्तर प्रदेश सरकार से पुरस्कृत भोजपुरी के प्रसिद्ध लेखक बृजमोहन प्रसाद अनारी ने बताया कि पूरे पूर्वांचल के साथ-साथ कजरी पूरे देश में भी चलन में है। धान की रोपनी, सोहनी में महिलाएं इसको गाती हैं। कजरी में अध्यात्म , संयोग , वियोग, विकास , हास-परिहास समस्त समाहित है। बड़ा दरद होला नरमी कलाई में , भांग के पिसाई में ना। भोला नाथ त्रिपुरारी, रऊरा भांग के अहारी, आगि लागि जाई नशा के पियाई में ना...इसमें अध्यात्म , पति के प्रति सद्भाव एवं नशा उन्मूलन सन्दर्भ छिपे हुये हैं। अरे राम ढ़ेर दिन पर पिया घरे अइहे, चुनरिया लेके अइहे ना, धनिया खूब अगराइल बाड़ी , मने धधाइल बाड़ी, अरे रामा फूल अस मन फुलइहे चुनरिया। सावन की रिमझिम फुहार के बीच झूला डालकर हंसी ठिठोली करते हुए कजरी गायन का अपने में एक अनोखा अंदाज है। कजरी एक सरस एवं माधुर्य से भरा लोक गीत है ।
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इनसेट=
महिलाओं के लिए खास है सावन
बलिया। सावन का महीना अपने आप में तमाम तीज त्यौहारों से भरपूर होता है । सावन की तीज और अन्य पर्व स्वस्थ मनोरंजन के साधन तथा मेल मिलाप के माध्यम होते हैं । श्रद्धा उमंग और खुमारी के संगम से शुरू होने वाले इस महीने का चरम हरियाली तीज पर पहुंचकर समाप्त होता है। भारतीय परंपरा में सावन आने का मतलब है सुहागनों के सजने संवरने के दिन, हाथों में हरी चूड़ियां और मेंहदी रचे हाथों से झूला झूलते हुए कजरी जैसे लोकगीतों से पूरे माहौल को खुशनुमा और रूमानी बना देना । सावन के इस महीने में कंहीं सपेरों की बीन और कहीं भाई का इंतज़ार करते बहनों को देखते ही बनता है, मानो दुनिया की तमाम परंपराओं और त्यौहारों का सतरंगी रूप इस एक महीने के आगे धूमिल हो।
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