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मुझे ठिकाना भी वही देगा, जिसने जीवन दिया
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अंकित यादव।
- फोटो : BAHRAICH
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बहराइच। 10 वर्षीय मासूम अंकित यादव को अब समाज, व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहा। बाल अवस्था में उसके पिता उसे हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर चले गए। पिता के मरने के बाद उसकी मां ने दूसरी शादी कर ली और वह भी अपने दूसरे पति के साथ अंकित को अनाथ छोड़कर चली गई। अंकित के लिए अब सिर्फ उसका घर बचा था, लेकिन घर को भी चाचा एवं अन्य परिजनों ने कब्जा कर लिया। बच्चे के कमरे से सारा सामान बाहर फेंककर अपना ताला जड़ दिया। अब यह सासूम बच्चा पेड़ के नीचे जीवन गुजारते हुए इस मिथ्या जगत की अनुभूति बचपने में ही कर रहा है। बच्चे के गांव वाले, जो बात-बात पर बड़ा बतंगड़ बनाते हैं, वह भी बच्चे को न्याय दिलाने आगे नहीं आ रहे हैं। आवारा स्थिति में घूमते हुए बच्चे की मुलाकात क्षेत्र पंचायत सदस्य अंजनी मिश्रा से हुई तो उन्होंने एसएचओ हुजूरपुर को प्रकरण अवगत कराते हुए बच्चे को जिलाधिकारी डॉ दिनेश चंद्र के समक्ष पेश होने की सलाह दी है।
अंकित यादव जब तीन वर्ष का था, तभी उसके पिता मायाराम यादव का निधन हो गया। निधन के बाद वह कुछ दिन नाना के यहां पला बढ़ा। कुछ दिन बाद उसकी मां ने दूसरा विवाह कर लिया अंकित को छोड़कर चली गई। लौटकर उसने भी अपने बेटे की ओर नहीं देखा। अंकित जब 10 वर्ष का हुआ तो नाना के घर वाले भी संभवत: उसे नहीं रख सके। वह जब अपने मूल घर आया तो कुछ समय रुका। लेकिन उसे चाचा और चचेरे भाई आदि ने उसे घर से बाहर भगा दिया। प्रयागराज स्नान के दिन तो हालत यह हुई कि अंकित के कमरे से सारा सामान निकालकर घर के बाहर फेंक दिया और उसे घर से बाहर भगा दिया। हैरान परेशान अंकित कुछ समझ ही नहीं पा रहा कि उसके साथ हो क्या रहा है। उसे किसी का सहारा नहीं है। वह गांव के पास लगे एक पेड़ के नीचे जीवन गुजार रहा है। सब कुछ होते हुए भी वह मांगकर खा रहा है।
इतनी कम उम्र में वह सिर्फ यही सोच रहा है कि मैं सबसे अलग क्यों हूं। गांव के सभी बच्चों के साथ कोई न कोई है, मेरे साथ कोई क्यों नहीं है। सभी घरों में रहते हैं, घर का खाना खाते हैं, मैं पेड़ के नीचे क्यों रहता हूं। मांग कर क्यों खाता हूं। अंकित के इन प्रश्नों का उत्तर गांव वाले भी नहीं दे पा रहे हैं। पेड़ के नीचे दिन गुजारता अंकित मानो मन में यही सोचता है कि मुझे ठिकाना भी वही देगा, जिसने जीवन दिया।
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दिलवाऊंगा बच्चे को न्याय
मुझे अंकित यादव की स्थिति के बारे में जानकारी हुई थी। मैं दो बार उसके घर भी जा चुका हूं। घर वालों को चेतावनी तक दे डाली, लेकिन वह नहीं मान रहे हैं। उच्चाधिकारियों से समझकर मैं इस बच्चे को न्याय दिलाऊंगा। -दद्दन सिंह, एसएचओ, हुजूरपुर
अंकित यादव से मेरी मुलाकात अचानक हुई। वह अभी अबोध है। गांव के एक व्यक्ति ने उसकी स्थिति के बारे में बताया। मैने एसएचओ, प्रधान आदि से बात की, लेकिन उनके प्रयासों से हल नहीं निकला। अभी मैं उस बच्चे के लगातार संपर्क में हूं। उसे डीएम साहब के पास पेश कराने विचार हैए उनकी भूमिका संरक्षक वाली है। अब वही न्याय भी दिला सकते हैं। -अंजनि मिश्रा, जिला पंचायत सदस्य
बच्चे को उसका घर दिलाने के लिए क्या-क्या नहीं किया। एसएचओ और जिला पंचायत सदस्य अंजनि मिश्रा के साथ भी कई बार गया। परिजनों को समझाया, लेकिन उन्हें इस अबोध बालक का दर्द नहीं महसूस हो रहा है। एसएचओ हुजूरपुर की भी नहीं सुनी जा रही है। -रक्षाराम यादव यादव, प्रधानपति, भाठीकुंडा हुजूरपुर
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अंकित यादव जब तीन वर्ष का था, तभी उसके पिता मायाराम यादव का निधन हो गया। निधन के बाद वह कुछ दिन नाना के यहां पला बढ़ा। कुछ दिन बाद उसकी मां ने दूसरा विवाह कर लिया अंकित को छोड़कर चली गई। लौटकर उसने भी अपने बेटे की ओर नहीं देखा। अंकित जब 10 वर्ष का हुआ तो नाना के घर वाले भी संभवत: उसे नहीं रख सके। वह जब अपने मूल घर आया तो कुछ समय रुका। लेकिन उसे चाचा और चचेरे भाई आदि ने उसे घर से बाहर भगा दिया। प्रयागराज स्नान के दिन तो हालत यह हुई कि अंकित के कमरे से सारा सामान निकालकर घर के बाहर फेंक दिया और उसे घर से बाहर भगा दिया। हैरान परेशान अंकित कुछ समझ ही नहीं पा रहा कि उसके साथ हो क्या रहा है। उसे किसी का सहारा नहीं है। वह गांव के पास लगे एक पेड़ के नीचे जीवन गुजार रहा है। सब कुछ होते हुए भी वह मांगकर खा रहा है।
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इतनी कम उम्र में वह सिर्फ यही सोच रहा है कि मैं सबसे अलग क्यों हूं। गांव के सभी बच्चों के साथ कोई न कोई है, मेरे साथ कोई क्यों नहीं है। सभी घरों में रहते हैं, घर का खाना खाते हैं, मैं पेड़ के नीचे क्यों रहता हूं। मांग कर क्यों खाता हूं। अंकित के इन प्रश्नों का उत्तर गांव वाले भी नहीं दे पा रहे हैं। पेड़ के नीचे दिन गुजारता अंकित मानो मन में यही सोचता है कि मुझे ठिकाना भी वही देगा, जिसने जीवन दिया।
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दिलवाऊंगा बच्चे को न्याय
मुझे अंकित यादव की स्थिति के बारे में जानकारी हुई थी। मैं दो बार उसके घर भी जा चुका हूं। घर वालों को चेतावनी तक दे डाली, लेकिन वह नहीं मान रहे हैं। उच्चाधिकारियों से समझकर मैं इस बच्चे को न्याय दिलाऊंगा। -दद्दन सिंह, एसएचओ, हुजूरपुर
अंकित यादव से मेरी मुलाकात अचानक हुई। वह अभी अबोध है। गांव के एक व्यक्ति ने उसकी स्थिति के बारे में बताया। मैने एसएचओ, प्रधान आदि से बात की, लेकिन उनके प्रयासों से हल नहीं निकला। अभी मैं उस बच्चे के लगातार संपर्क में हूं। उसे डीएम साहब के पास पेश कराने विचार हैए उनकी भूमिका संरक्षक वाली है। अब वही न्याय भी दिला सकते हैं। -अंजनि मिश्रा, जिला पंचायत सदस्य
बच्चे को उसका घर दिलाने के लिए क्या-क्या नहीं किया। एसएचओ और जिला पंचायत सदस्य अंजनि मिश्रा के साथ भी कई बार गया। परिजनों को समझाया, लेकिन उन्हें इस अबोध बालक का दर्द नहीं महसूस हो रहा है। एसएचओ हुजूरपुर की भी नहीं सुनी जा रही है। -रक्षाराम यादव यादव, प्रधानपति, भाठीकुंडा हुजूरपुर