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तबाही के कगार पर महाराजा रणजीत सिंह के वंशजों का किला

Tue, 18 Jul 2017 10:11 PM IST
बहराइच
बहराइच Updated Tue, 18 Jul 2017 10:11 PM IST
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Fortress of the descendants of Maharaja Ranjit Singh on the verge of catastrophe
बहराइच के महसी में घाघरा की कटान के निशाने पर आया राजा रणजीत सिंह के वशंजाें का किला। - फोटो : अमर उजाला
जहां कभी आजादी के आंदोलन की अलख जगाई जाती थी, इंकलाब के नारे बुलंद होते थे। इन नारों की गूंज समेटे पिपरी किले का वजूद मिट्टी में मिलने के कगार पर है। संघर्षों से अंग्रेजों से तो जीत हासिल कर ली, लेकिन अपनों ने उपेक्षित कर दिया। जिसके चलते अब किले की यादों को ईंट के रूप में सहेजने के लिए उस पर हथौड़े चलाए जा रहे हैं।
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कारण, किला और घागरा नदी के बीच महज 20 मीटर का फासला बचा है। लेकिन इतिहास के इस पन्ने को सुरक्षित करने के लिए अब तक प्रशासन ने कोई कदम नहीं उठाया है। किले की ओर घाघरा की लहरों को बढ़ते देख अब किले के वारिस उसकी ईंटों को सुरक्षित करने की कवायद में जुटे हैं। 
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वर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद वायसराय ने इलाहाबाद में राजे रजवाड़ों की मीटिंग बुला महारानी विक्टोरिया के घोषणा पत्र सुनाया था। इस घोषणा पत्र के बाद अंग्रेेजों ने छीनी गई रियासतों का बंटवारा किया। उसी बंटवारे में बहराइच के पिपरी रियासत के 33 गांव पंजाब के राजा रणजीत सिंह के वंशजों के पाले में आए।
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इस रियासत पर राजा जगदेव सिंह को कब्जा मिला। बाद में उन्होंने अपनी बहन कुंवरि सिंह को पिपरी रियासत दान दे दी। उसी के तहत वर्ष 1867 में किले का निर्माण कराया गया था। लगभग एक एकड़ में किले की प्राचीर है। इसके अलावा किले के आसपास 25 एकड़  जमीन धरोहर का परिसर माना जाता है।

यह किला राजा दलजीत सिंह के पिता राजा जगजोत सिंह ने बनवाया था। किले का निर्माण होने के बाद यहां पर भी स्वतंत्रता आंदोलन के तराने गाए जाते थे। 1885 में कांग्रेस की स्थापना के बाद जब स्वतंत्रता आंदोलन का नया दौर शुरू हुआ। तब इस किले में भी अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की रूपरेखा बनती थी।

पिपरी रियासत के वंशज राजा दलबीर सिंह का कहना है कि स्वतंत्रता आंदोलन के लिए किले में गुपचुप योजनाएं बनती थीं। उसी के तहत क्षेत्र के लोग अंग्रेजों का सामना करते थे। लेकिन गुलामी की बेड़ियों को काटने की रूपरेखा तय करनेे के गवाह इस किले का अस्तित्व इस समय खतरे में है।


इस धरोहर को घाघरा की लहरें लीलने को बेताब दिख रही हैं। नदी व किले के बीच महज 20 मीटर का फासला बचा है। नदी की लहरें कटान करते हुए किले की ओर बढ़ रही हैं। लेकिन अब तक इस धरोहर को सुरक्षित करने के उपाय नहीं किए गए हैं।
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