बहराइच के सपूतों ने भी मनवाया लोहा

अमर उजाला ब्यूरो/बहराइच Updated Thu, 13 Aug 2015 10:19 PM IST
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बहराइच। स्वतंत्रता संग्राम में हमारे बहराइच की भी अहम भूमिका रही है। 1857 की क्रांति का बिगुल बजने के बाद 1859 में बहराइच अंग्रेजों की दास्तां से मुक्त हो चुका था।
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इसी के साथ देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए लोगों ने संकल्प लिया और देश के लिए अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया।
लाखों लोगों के संघर्ष और कुर्बानी के बाद हमें आजादी मिली। इस लड़ाई में अवध क्षेत्र के सभी जिलों का बड़ा योगदान रहा। बहराइच ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1857 की क्रांति के बाद बहराइच के रजवाड़ों ने अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंका तो उस समय बहराइच, लेफ्टिनेंट लांग बलि क्लार्क और डिप्टी कमिश्नर कनलिफ के कब्जे में था।

लखनऊ-बहराइच के बीच चिनहट के पास युद्ध हुआ। युद्ध में चहलारी नरेश राजा बलभद्र सिंह शहीद हुए। बुजुर्ग बताते हैं कि सिर कटने के बाद भी चहलारी नरेश का धड़ अंग्रेजों से घंटों युद्ध करता रहा। इसके बाद टेपरहा रियासत का किला अंग्रेजों ने ध्वस्त कर दिया। नानपारा शहर को भी उजाड़ दिया था।

राजा बौंडी सवाई माधव सिंह और राजा चरदा भी युद्ध में शहीद हुए थे। िफर लोगों ने देश को आजादी दिलाने का संकल्प लेकर अपने कदम आगे बढ़ाए हैं।

वर्ष 1920 में कांग्रेस स्थापना की पहली बैठक घंटाघर में हुई, जिसमें रामशरण, जुगलबिहारी, मुरारीलाल, दुर्गा चरण, श्याम बिहारी ने गोलवाघाट पर विदेशी कपड़े उतारकर मातृभूमि की सेवा की शपथ ली। 1929 में महात्मा गांधी जब बहराइच आए तब आंदोलन ने गति पकड़ी और 1947 में देश आजाद हुआ।

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