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पानी के आर्सेनिक ने बिगाड़ी सूरत
अमर उजाला ब्यूरो/बहराइच
Updated Thu, 04 Feb 2016 09:52 PM IST
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बहराइच/उर्रा। मोतीपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर अचानक चर्म रोग पीड़ितों की संख्या बढ़ गई है। प्रतिदिन यहां 10 से 15 रोगी पहुंच रहे हैं।
किसी का पूरा चेहरा ही काला पड़ गया है तो किसी के शरीर पर जगह-जगह चकत्ते पड़ गए हैं। ये हाल सिर्फ एक-दो नहीं बल्कि पूरे 30 गांवों के लोगों का है, जो घाघरा के कछार में बसे हैं।
स्वास्थ्य केंद्र अधीक्षक डॉ. बासुदेव वर्मा ने इसे आर्सेनिक युक्त पानी के उपयोग का नतीजा बताया है। उनके अनुसार इस पानी से लोगों में टीनिया कारपोरिस फंगल डिजीज हो गया है।
स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी ने इस मामले में सीएमओ को पत्र लिखकर पानी की जांच कराने का आग्रह किया है।
मिहींपुरवा ब्लॉक के 30 गांव जंगल के किनारे और घाघरा की कछार के बीच बसे हैं। दो वर्ष से यहां के लोग त्वचा संबंधी बीमारियों से मामूली रूप से ग्रसित थे।
लेकिन, छह माह से जब लोगों की काया बदसूरत होने लगी तब ग्रामीण चेते। अब किसी के चेहरे का रंग पूरी तरह बदल चुका था तो किसी के हाथ, पैर, और गले पर दाद, एक्जीमा जैसे निशान बन गए हैं।
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सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मोतीपुर के चिकित्साधीक्षक डॉ. बासुदेव वर्मा ने बताया कि दो-चार मरीजों से शुरू हुआ सिलसिला अब प्रतिदिन औसतन 15 मरीज तक पहुंच चुका है।
उनका कहना है कि जो मरीज आ रहे हैं, उनके लक्षणों से स्पष्ट है कि वे आर्सेनिक युक्त पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं। इलाके में भू-जल में शायद आर्सेनिक की मात्रा काफी अधिक हो गई है, इसकी जांच के लिए सीएमओ को पत्र लिखा है। पानी की जांच करवाकर आगे के उपाय किए जाएंगे।
ऐसे पनपती है टीनिया कारपोरिस फंगल डिजीज
जिले के वरिष्ठ त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह ने कहा कि आर्सेनिक की मात्रा पानी में होती है लेकिन जब यह मात्रा पांच फीसदी से अधिक हो तो शरीर के लिए नुकसानदायक हो जाती है।
इसका असर तत्काल नहीं दिखाई देता बल्कि डेढ़ से दो वर्ष तक पानी के निरंतर उपयोग करने पर त्वचा शुष्क हो जाती है। टीनिया कारपोरिस फंगल डिजीज ऐसी बीमारी है जिसमें शुरुआती दौर में दाद, खाज, खुजली जैसे लक्षण दिखाई देते हैं लेकिन फिर यह ठीक नहीं होते।
चमड़ी उजड़ने लगती हैं और हड्डियां खोखली होने लगती है। दांत का रंग बदलने लगता है। बच्चों का मानसिक विकास भी प्रभावित होता है।
जल निगम को लिख रहे पत्र, करवाएंगे जांच
मुख्य चिकित्साधीक्षक डॉ. केबी जैन का कहना है कि मिहींपुरवा क्षेत्र में त्वचा संबंधी बीमारियों के फैलने की सूचना मिली है। ऐसे में पानी की जांच के लिए जल निगम को पत्र लिख रहे हैं लेकिन इसमें कुुछ समय लगेगा।
तब तक ग्रामीण पानी को उबालकर ही प्रयोग करें। उबालने के दौरान तलहटी और पानी के ऊपर जमे सफेद तत्व को हटा दें।
सर्वे में सच आया था सामने
तराई के पानी में आर्सेनिक की मात्रा जांचने के लिए पानी की शुद्धता पर काम करने वाली जापान की मियाजाकी यूनिवर्सिटी और कानपुर की ईको संस्था ने वर्ष 2008 व वर्ष 2011 में जनपद में आर्सेनिक की बढ़ती मात्रा पर सर्वे कार्य किया था।
इसमें सर्वाधिक आर्सेनिक प्रभावित विकासखंड तेजवापुर मिला था। मिहींपुरवा व हुजूरपुर दूसरे तथा तीसरे नंबर पर थे। इसके बाद संस्था ने तेजवापुर को प्रमुखता देते हुए काम शुरू किया था लेकिन मिहींपुरवा व हुजूरपुर में कार्य नहीं हुआ। जिसका नतीजा है कि मिहींपुरवा में बड़े पैमाने पर अब रोगी सामने आ रहे हैं।
किसी के सामने जाने की नहीं होती इच्छा
कल्लूगौढ़ी निवासी माया देवी के पूरे शरीर में दाद जैसे निशान पड़ गए हैं। पेट, पीठ, गला, पैर व अन्य स्थानों पर चमड़ी पूरी तरह उजड़ रही है। दर्द के साथ असहनीय खुजली का सामना करना पड़ रहा है।
माया का कहना है कि बीमारी ने जिंदगी बर्बाद कर दी। किसी के सामने जाने की हिम्मत नहीं होती। गुलालपुरवा गांव निवासी बनवारी लाल के हाथ और पैर की चमड़ी उजड़ रही है।
वहीं दयाराम यादव, मनोज कुमार, दरोगापुरवा निवासी पहलवान नाई, गोपिया निवासी सरवन कुमार, कल्लू गौढ़ी निवासी राकेश कुमार, संतराम यादव और पवन सोनी भी इलाज कराते-कराते परेशान हो चुके हैं।
इन सबका कहना है कि छह माह से निरंतर इलाज करा रहे हैं लेकिन मर्ज बढ़ता ही जा रहा है। हैंडपंप के ही पानी का सहारा है, उसे न पीयें तो कैसे काम चले। कुड़वा गांव निवासी उदयराज वर्मा का पूरा चेहरा काला पड़ गया है।
उदयराज का कहना है कि सीएचसी और जिला अस्पताल में लाभ न होने पर पीजीआई के डॉक्टरों को दिखाया था। सभी पानी न पीने की सलाह दे रहे हैं लेकिन हम इतने बड़े आदमी नहीं कि बोतल का पानी पी सकें।
तीन माह तक लखनऊ से इलाज किया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मिहींपुरवा निवासी रणधीर और गुलरा निवासी जमील ने गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में इलाज कराया लेकिन समस्या जस की तस है।
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किसी का पूरा चेहरा ही काला पड़ गया है तो किसी के शरीर पर जगह-जगह चकत्ते पड़ गए हैं। ये हाल सिर्फ एक-दो नहीं बल्कि पूरे 30 गांवों के लोगों का है, जो घाघरा के कछार में बसे हैं।
स्वास्थ्य केंद्र अधीक्षक डॉ. बासुदेव वर्मा ने इसे आर्सेनिक युक्त पानी के उपयोग का नतीजा बताया है। उनके अनुसार इस पानी से लोगों में टीनिया कारपोरिस फंगल डिजीज हो गया है।
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स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी ने इस मामले में सीएमओ को पत्र लिखकर पानी की जांच कराने का आग्रह किया है।
मिहींपुरवा ब्लॉक के 30 गांव जंगल के किनारे और घाघरा की कछार के बीच बसे हैं। दो वर्ष से यहां के लोग त्वचा संबंधी बीमारियों से मामूली रूप से ग्रसित थे।
लेकिन, छह माह से जब लोगों की काया बदसूरत होने लगी तब ग्रामीण चेते। अब किसी के चेहरे का रंग पूरी तरह बदल चुका था तो किसी के हाथ, पैर, और गले पर दाद, एक्जीमा जैसे निशान बन गए हैं।
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सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मोतीपुर के चिकित्साधीक्षक डॉ. बासुदेव वर्मा ने बताया कि दो-चार मरीजों से शुरू हुआ सिलसिला अब प्रतिदिन औसतन 15 मरीज तक पहुंच चुका है।
उनका कहना है कि जो मरीज आ रहे हैं, उनके लक्षणों से स्पष्ट है कि वे आर्सेनिक युक्त पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं। इलाके में भू-जल में शायद आर्सेनिक की मात्रा काफी अधिक हो गई है, इसकी जांच के लिए सीएमओ को पत्र लिखा है। पानी की जांच करवाकर आगे के उपाय किए जाएंगे।
ऐसे पनपती है टीनिया कारपोरिस फंगल डिजीज
जिले के वरिष्ठ त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह ने कहा कि आर्सेनिक की मात्रा पानी में होती है लेकिन जब यह मात्रा पांच फीसदी से अधिक हो तो शरीर के लिए नुकसानदायक हो जाती है।
इसका असर तत्काल नहीं दिखाई देता बल्कि डेढ़ से दो वर्ष तक पानी के निरंतर उपयोग करने पर त्वचा शुष्क हो जाती है। टीनिया कारपोरिस फंगल डिजीज ऐसी बीमारी है जिसमें शुरुआती दौर में दाद, खाज, खुजली जैसे लक्षण दिखाई देते हैं लेकिन फिर यह ठीक नहीं होते।
चमड़ी उजड़ने लगती हैं और हड्डियां खोखली होने लगती है। दांत का रंग बदलने लगता है। बच्चों का मानसिक विकास भी प्रभावित होता है।
जल निगम को लिख रहे पत्र, करवाएंगे जांच
मुख्य चिकित्साधीक्षक डॉ. केबी जैन का कहना है कि मिहींपुरवा क्षेत्र में त्वचा संबंधी बीमारियों के फैलने की सूचना मिली है। ऐसे में पानी की जांच के लिए जल निगम को पत्र लिख रहे हैं लेकिन इसमें कुुछ समय लगेगा।
तब तक ग्रामीण पानी को उबालकर ही प्रयोग करें। उबालने के दौरान तलहटी और पानी के ऊपर जमे सफेद तत्व को हटा दें।
सर्वे में सच आया था सामने
तराई के पानी में आर्सेनिक की मात्रा जांचने के लिए पानी की शुद्धता पर काम करने वाली जापान की मियाजाकी यूनिवर्सिटी और कानपुर की ईको संस्था ने वर्ष 2008 व वर्ष 2011 में जनपद में आर्सेनिक की बढ़ती मात्रा पर सर्वे कार्य किया था।
इसमें सर्वाधिक आर्सेनिक प्रभावित विकासखंड तेजवापुर मिला था। मिहींपुरवा व हुजूरपुर दूसरे तथा तीसरे नंबर पर थे। इसके बाद संस्था ने तेजवापुर को प्रमुखता देते हुए काम शुरू किया था लेकिन मिहींपुरवा व हुजूरपुर में कार्य नहीं हुआ। जिसका नतीजा है कि मिहींपुरवा में बड़े पैमाने पर अब रोगी सामने आ रहे हैं।
किसी के सामने जाने की नहीं होती इच्छा
कल्लूगौढ़ी निवासी माया देवी के पूरे शरीर में दाद जैसे निशान पड़ गए हैं। पेट, पीठ, गला, पैर व अन्य स्थानों पर चमड़ी पूरी तरह उजड़ रही है। दर्द के साथ असहनीय खुजली का सामना करना पड़ रहा है।
माया का कहना है कि बीमारी ने जिंदगी बर्बाद कर दी। किसी के सामने जाने की हिम्मत नहीं होती। गुलालपुरवा गांव निवासी बनवारी लाल के हाथ और पैर की चमड़ी उजड़ रही है।
वहीं दयाराम यादव, मनोज कुमार, दरोगापुरवा निवासी पहलवान नाई, गोपिया निवासी सरवन कुमार, कल्लू गौढ़ी निवासी राकेश कुमार, संतराम यादव और पवन सोनी भी इलाज कराते-कराते परेशान हो चुके हैं।
इन सबका कहना है कि छह माह से निरंतर इलाज करा रहे हैं लेकिन मर्ज बढ़ता ही जा रहा है। हैंडपंप के ही पानी का सहारा है, उसे न पीयें तो कैसे काम चले। कुड़वा गांव निवासी उदयराज वर्मा का पूरा चेहरा काला पड़ गया है।
उदयराज का कहना है कि सीएचसी और जिला अस्पताल में लाभ न होने पर पीजीआई के डॉक्टरों को दिखाया था। सभी पानी न पीने की सलाह दे रहे हैं लेकिन हम इतने बड़े आदमी नहीं कि बोतल का पानी पी सकें।
तीन माह तक लखनऊ से इलाज किया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मिहींपुरवा निवासी रणधीर और गुलरा निवासी जमील ने गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में इलाज कराया लेकिन समस्या जस की तस है।