{"_id":"5f55203e8ebc3e44c33430a1","slug":"what-is-the-use-of-wounding-aman-should-remain-alive-in-our-village-baghpat-news-mrt4998900182","type":"story","status":"publish","title_hn":"घाव कुरेदने से क्या फायदा, हमारे गांव में जिंदा रहना चाहिए अमन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
घाव कुरेदने से क्या फायदा, हमारे गांव में जिंदा रहना चाहिए अमन
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मुजफ्फरनगर दंगे से प्रभावित हुए लोगों का कहना, बुरा वक्त था, बीत गया
बागपत/बड़ौत। मुजफ्फरनगर दंगे में जिला भी झुलस गया था। वाजिदपुर गांव में बच्चे समेत दो लोगों की हत्या हो गई थी। दहशत के चलते मृतक बच्चे के परिवार ने गांव से पलायन कर दिया था। एक मृतक के परिजन अभी भी गांव में रहते है। उनका कहना है कि बुरा वक्त बीत गया है, अब वह दुआ करते हैं कि गांव में हमेशा अमन-चैन रहना चाहिए।
वाजिदपुर गांव में आठ सितंबर 2013 की रात में धार्मिक स्थल में फायरिंग हुई थी। गोली लगने से किशोर शोएब पुत्र नदीम की मौके पर ही मौत हो गई थी जबकि इकबाल गोली लगने से घायल हो गया था। बाद में इकबाल की उपचार के दौरान बाद में मौत हो गई थी। शोएब के परिजनों ने गांव से पलायन कर दिया था। ग्रामीणों के अनुसार वर्षों से उनका गांव में स्थित मकान सुनसान पड़ा है, वे इस समय दिल्ली के दिलशाद गार्डन में रहते है, दंगे के बाद से आज तक गांव नहीं लौटे। कभी-कभार फोन पर मोहल्ले के लोगों से बातचीत कर लेते है। उधर दूसरे मृतक इकबाल पुत्र कबूल का परिवार गांव में रहता है। इकबाल के चार बेटे मोमीन, इलियास, शौकीन, नौशाद व चार बेटी रूकसाना, अफसाना, मोमीना, नसीमा है। मृतक के बेटे मोमीन और इलियास कहते है कि बुरे दिन थे, बीत गए।
हम भूल जाना चाहते हैं हर बात
बागपत। नगर के केतीपुरा की नई बस्ती में रह रहे मुजफ्फरनगर के मोहम्मदपुर राय सिंह निवासी मेहरदीन का कहना है कि बुरा वक्त बीत गया। गांव और जिला छूटा। जिंदगी पटरी पर लौट रही है। पलायन कर यहां आए थे। अब हम हर बात को भूल जाना चाहते हैं। सरकार से उम्मीद है कि बस हमारी मदद जरूर करें।
विज्ञापन
विज्ञापन
बागपत/बड़ौत। मुजफ्फरनगर दंगे में जिला भी झुलस गया था। वाजिदपुर गांव में बच्चे समेत दो लोगों की हत्या हो गई थी। दहशत के चलते मृतक बच्चे के परिवार ने गांव से पलायन कर दिया था। एक मृतक के परिजन अभी भी गांव में रहते है। उनका कहना है कि बुरा वक्त बीत गया है, अब वह दुआ करते हैं कि गांव में हमेशा अमन-चैन रहना चाहिए।
वाजिदपुर गांव में आठ सितंबर 2013 की रात में धार्मिक स्थल में फायरिंग हुई थी। गोली लगने से किशोर शोएब पुत्र नदीम की मौके पर ही मौत हो गई थी जबकि इकबाल गोली लगने से घायल हो गया था। बाद में इकबाल की उपचार के दौरान बाद में मौत हो गई थी। शोएब के परिजनों ने गांव से पलायन कर दिया था। ग्रामीणों के अनुसार वर्षों से उनका गांव में स्थित मकान सुनसान पड़ा है, वे इस समय दिल्ली के दिलशाद गार्डन में रहते है, दंगे के बाद से आज तक गांव नहीं लौटे। कभी-कभार फोन पर मोहल्ले के लोगों से बातचीत कर लेते है। उधर दूसरे मृतक इकबाल पुत्र कबूल का परिवार गांव में रहता है। इकबाल के चार बेटे मोमीन, इलियास, शौकीन, नौशाद व चार बेटी रूकसाना, अफसाना, मोमीना, नसीमा है। मृतक के बेटे मोमीन और इलियास कहते है कि बुरे दिन थे, बीत गए।
विज्ञापन
हम भूल जाना चाहते हैं हर बात
बागपत। नगर के केतीपुरा की नई बस्ती में रह रहे मुजफ्फरनगर के मोहम्मदपुर राय सिंह निवासी मेहरदीन का कहना है कि बुरा वक्त बीत गया। गांव और जिला छूटा। जिंदगी पटरी पर लौट रही है। पलायन कर यहां आए थे। अब हम हर बात को भूल जाना चाहते हैं। सरकार से उम्मीद है कि बस हमारी मदद जरूर करें।
विज्ञापन