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Baghpat News: सच्चे गुरु की छत्रछाया में शिष्य श्रेष्ठता को प्राप्त करता
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-ऋषभ सभागार में विद्वत गोष्ठी में बोले आचार्य विशुद्ध सागर महाराज
फोटो संख्या 8
बड़ौत। आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि गुरु के बिना शिष्य का कल्याण-मार्ग प्रशस्त नहीं होता है। सच्चे गुरु की छत्रछाया में शिष्य श्रेष्ठता को प्राप्त करता है। गुरु शिष्य को ज्ञान-ध्यान एवं आचरण के गुर प्रदान करते हैं। गुरु का निर्देशन ही शिष्य को योग्य बनाता है।
जैनमुनि शनिवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि सच्चे शिष्य को गुरु भक्त, विनयशील, भव से भयभीत, प्रमाद-आलस रहित, धार्मिक, नम्र, उत्साह वान, विद्वान, कल्याण-इच्छुक होना चाहिए। कहा कि गुरु आज्ञा ही शिष्य के लिए प्राण होती है। हितकारी, पात्र, स्नेही, करुणावान, दयालु, गंभीर, मधुर भाषी, ज्येष्ठ, धैर्यवान, निष्प्रह, ज्ञानी-ध्यानी, तपस्वी, निष्कलंक, अपरिग्रही, दूर दृष्टा, मौन प्रिय, दीर्घसूत्री, अनुरसित, अनुभवी और स्व-पर कल्याण कारक धर्म मार्ग के सच्चे गुरु होते हैं। गुरु और शिष्य का श्रद्धा-श्रद्धेय संबंध होता है। सच्चा गुरु ही शिष्य को धर्म मार्ग पर अग्रसर करता है। गुरु मां की तरह शिष्य का संरक्षण एवं सुरक्षण करते हैं। गुरु महान होते हैं। सच्चा शिष्य गुरु के उपकारों को कभी नहीं भूलता है। वह हमेशा अपने गुरु के प्रति विनम्र रहता है। पुण्य क्षीण होने पर अशुभ विचार उत्पन्न होते हैं, जो व्यक्ति अनाचार करता है। वह पहले व्यसनों में लिप्त होकर, कषाय में आसक्त होकर अपनी बुद्धि को भ्रष्ट करता है। इसके पश्चात वह कुकर्म में प्रवृत्त होता है। सभा का संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में पंडित वीरसागर, डा. सोनल शास्त्री, पंडित विनोद, दिनेश जैन आदि मौजूद रहे।
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बड़ौत। आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि गुरु के बिना शिष्य का कल्याण-मार्ग प्रशस्त नहीं होता है। सच्चे गुरु की छत्रछाया में शिष्य श्रेष्ठता को प्राप्त करता है। गुरु शिष्य को ज्ञान-ध्यान एवं आचरण के गुर प्रदान करते हैं। गुरु का निर्देशन ही शिष्य को योग्य बनाता है।
जैनमुनि शनिवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि सच्चे शिष्य को गुरु भक्त, विनयशील, भव से भयभीत, प्रमाद-आलस रहित, धार्मिक, नम्र, उत्साह वान, विद्वान, कल्याण-इच्छुक होना चाहिए। कहा कि गुरु आज्ञा ही शिष्य के लिए प्राण होती है। हितकारी, पात्र, स्नेही, करुणावान, दयालु, गंभीर, मधुर भाषी, ज्येष्ठ, धैर्यवान, निष्प्रह, ज्ञानी-ध्यानी, तपस्वी, निष्कलंक, अपरिग्रही, दूर दृष्टा, मौन प्रिय, दीर्घसूत्री, अनुरसित, अनुभवी और स्व-पर कल्याण कारक धर्म मार्ग के सच्चे गुरु होते हैं। गुरु और शिष्य का श्रद्धा-श्रद्धेय संबंध होता है। सच्चा गुरु ही शिष्य को धर्म मार्ग पर अग्रसर करता है। गुरु मां की तरह शिष्य का संरक्षण एवं सुरक्षण करते हैं। गुरु महान होते हैं। सच्चा शिष्य गुरु के उपकारों को कभी नहीं भूलता है। वह हमेशा अपने गुरु के प्रति विनम्र रहता है। पुण्य क्षीण होने पर अशुभ विचार उत्पन्न होते हैं, जो व्यक्ति अनाचार करता है। वह पहले व्यसनों में लिप्त होकर, कषाय में आसक्त होकर अपनी बुद्धि को भ्रष्ट करता है। इसके पश्चात वह कुकर्म में प्रवृत्त होता है। सभा का संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में पंडित वीरसागर, डा. सोनल शास्त्री, पंडित विनोद, दिनेश जैन आदि मौजूद रहे।
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