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शब-ए-बरात पर अकीदतमंदों ने की रात भर इबादत
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कुरान ए पाक की तिलावत की
संवाद न्यूज एजेंसी
अग्रवाल मंडी टटीरी। शब-ए-बरात पर रविवार को मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपने गुनाहों की माफी के लिए रातभर घरों में ही अल्लाह की इबादत और कुरान ए पाक की तिलावत की। कोरोना से बचाव के लिए मस्जिद बंद रहीं, जिसके कारण लोगों ने घरों में इबादत की। मरहूमों की मगफिरत के किए कब्रिस्तान में जाकर फातिहा भी पढ़ा।
कस्बे की देशवाल पट्टी स्थित मस्जिद के मौलाना हाजी जहीर अहमद ने बताया कि मुस्लिम समुदाय के लिए शब-ए-बरात एक प्रमुख त्योहार है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार शब-ए-बरात का त्योहार शाबान महीने की 14वीं तारीख और 15वीं तारीख के मध्य रात को मनाया जाता है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार शब-ए-बरात में इबादत करने वाले लोगों के सारे गुनाह माफ हो जाते हैं। इसलिए लोग शब-ए-बरात में अल्लाह की इबादत करते हैं और उनसे अपने गुनाहों को माफ करने की दुआ मांगते हैं।
क्यों खास है शब-ए-बरात
मौलाना हाजी जाहिर अहमद बताते है कि शब-ए-बरात का अर्थ है शब यानी रात और बरात यानी बरी होना। शब-ए-बरात की रात को इस दुनिया को छोड़कर जाने वाले अपने पूर्वजों की कब्रों में रोशनी और उनके लिए दुआ मांगी जाती है। मान्यता के अनुसार इस रात अल्लाह अपने चाहने वालों को हिसाब-किताब रखने के लिए आते हैं। इस दिन जो भी सच्चे मन से अल्लाह से अपने गुनाहों की तौबा करता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत के दरवाजे खोल देता है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
अग्रवाल मंडी टटीरी। शब-ए-बरात पर रविवार को मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपने गुनाहों की माफी के लिए रातभर घरों में ही अल्लाह की इबादत और कुरान ए पाक की तिलावत की। कोरोना से बचाव के लिए मस्जिद बंद रहीं, जिसके कारण लोगों ने घरों में इबादत की। मरहूमों की मगफिरत के किए कब्रिस्तान में जाकर फातिहा भी पढ़ा।
कस्बे की देशवाल पट्टी स्थित मस्जिद के मौलाना हाजी जहीर अहमद ने बताया कि मुस्लिम समुदाय के लिए शब-ए-बरात एक प्रमुख त्योहार है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार शब-ए-बरात का त्योहार शाबान महीने की 14वीं तारीख और 15वीं तारीख के मध्य रात को मनाया जाता है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार शब-ए-बरात में इबादत करने वाले लोगों के सारे गुनाह माफ हो जाते हैं। इसलिए लोग शब-ए-बरात में अल्लाह की इबादत करते हैं और उनसे अपने गुनाहों को माफ करने की दुआ मांगते हैं।
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क्यों खास है शब-ए-बरात
मौलाना हाजी जाहिर अहमद बताते है कि शब-ए-बरात का अर्थ है शब यानी रात और बरात यानी बरी होना। शब-ए-बरात की रात को इस दुनिया को छोड़कर जाने वाले अपने पूर्वजों की कब्रों में रोशनी और उनके लिए दुआ मांगी जाती है। मान्यता के अनुसार इस रात अल्लाह अपने चाहने वालों को हिसाब-किताब रखने के लिए आते हैं। इस दिन जो भी सच्चे मन से अल्लाह से अपने गुनाहों की तौबा करता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत के दरवाजे खोल देता है।
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