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तप आत्म शुद्धि का मार्ग है: श्रीयांश
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दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन उत्तम तप धर्म को अंगीकार किया
बड़ौत। पंडित डॉ. श्रीयांश जैन ने कहा कि तप आत्म शुद्धि का मार्ग है। जब तक धूप में फल नहीं पकता उसमें मिठास नहीं आती है। धूप में पकते ही मिठास आ जाती है। अग्नि में तप कर ही सोना शुद्ध होकर चमकने लगता है। उसी तरह साधना की आग में तप कर आत्मा पवित्र हो जाती हैं। चमकना है तो तपो, मिटटी में घड़ा बनने की योग्यता है, पर बिना क्रिया किए मिटटी घड़ा नहीं बन सकती। जैसे दूध में घी है, लेकिन घी प्राप्त करने के लिए प्रक्रिया पूरी करनी पड़ेगी। बिना प्रक्रिया के दूध से घी निकलना संभव नहीं है।
उन्होंने यह संदेश शनिवार को दशलक्षण के सातवें दिन दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में श्रद्धालुओं को दिया। उन्होंने कहा कि इसी प्रकार आत्मा में परमात्मा शक्ति मौजूद है यानी आत्मा में परमात्मा विराजमान है। लेकिन जैसे बिना छेनी के पाषाण से प्रतिमा नहीं निकलती ठीक वैसे ही बिना तप के आत्मा परमात्मा नहीं बन सकती। आलस्य का त्याग करके ज्ञान की आराधना करना स्वाध्याय तप है। इस दौरान सभी श्रद्धालुओं ने घरों व मंदिरों में पूजा-अर्चना कर उत्तम तप धर्म को अंगीकार किया। मंदिर में सर्वप्रथम श्री जी का अभिषेक किया गया। तेरह द्वीप की सादगी पूर्वक पूजा की गई। कार्यक्रम में प्रवीण जैन, अतुल जैन, सुरेन्द्र जैन आदि रहे।
इनके अलावा नेहरू रोड स्थित पार्श्वनाथ मंदिर में दश लक्षण महापर्व के सातवें दिन उत्तम तप धर्म को अंगीकार किया गया जिसमें ललित जैन, तुषार जैन, सभासद, अशोक जैन, अमित जैन छपरोली वालों ने श्री जी प्रक्षालन व अभिषेक किया। शांति धारा कर सर्व जग में शांति हो और प्राणी स्वस्थ रहें ऐसी कामना की। इस अवसर पर सतेन्द्र जैन, अनिल जैन, नेमचंद जैन, आदिश जैन रहे।
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बड़ौत। पंडित डॉ. श्रीयांश जैन ने कहा कि तप आत्म शुद्धि का मार्ग है। जब तक धूप में फल नहीं पकता उसमें मिठास नहीं आती है। धूप में पकते ही मिठास आ जाती है। अग्नि में तप कर ही सोना शुद्ध होकर चमकने लगता है। उसी तरह साधना की आग में तप कर आत्मा पवित्र हो जाती हैं। चमकना है तो तपो, मिटटी में घड़ा बनने की योग्यता है, पर बिना क्रिया किए मिटटी घड़ा नहीं बन सकती। जैसे दूध में घी है, लेकिन घी प्राप्त करने के लिए प्रक्रिया पूरी करनी पड़ेगी। बिना प्रक्रिया के दूध से घी निकलना संभव नहीं है।
उन्होंने यह संदेश शनिवार को दशलक्षण के सातवें दिन दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में श्रद्धालुओं को दिया। उन्होंने कहा कि इसी प्रकार आत्मा में परमात्मा शक्ति मौजूद है यानी आत्मा में परमात्मा विराजमान है। लेकिन जैसे बिना छेनी के पाषाण से प्रतिमा नहीं निकलती ठीक वैसे ही बिना तप के आत्मा परमात्मा नहीं बन सकती। आलस्य का त्याग करके ज्ञान की आराधना करना स्वाध्याय तप है। इस दौरान सभी श्रद्धालुओं ने घरों व मंदिरों में पूजा-अर्चना कर उत्तम तप धर्म को अंगीकार किया। मंदिर में सर्वप्रथम श्री जी का अभिषेक किया गया। तेरह द्वीप की सादगी पूर्वक पूजा की गई। कार्यक्रम में प्रवीण जैन, अतुल जैन, सुरेन्द्र जैन आदि रहे।
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इनके अलावा नेहरू रोड स्थित पार्श्वनाथ मंदिर में दश लक्षण महापर्व के सातवें दिन उत्तम तप धर्म को अंगीकार किया गया जिसमें ललित जैन, तुषार जैन, सभासद, अशोक जैन, अमित जैन छपरोली वालों ने श्री जी प्रक्षालन व अभिषेक किया। शांति धारा कर सर्व जग में शांति हो और प्राणी स्वस्थ रहें ऐसी कामना की। इस अवसर पर सतेन्द्र जैन, अनिल जैन, नेमचंद जैन, आदिश जैन रहे।
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