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गन्ना पेराई सत्र में शोला न बन जाए कृषि विधेयक के विरोध की चिंगारी

Sat, 26 Sep 2020 11:48 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 26 Sep 2020 11:48 PM IST
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Sugarcane crushing season should not become shola spark of opposition to Agriculture Bill
किसान आंदोलन :
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- भाव और भुगतान के मुद्दे पर किसान संगठनों की लामबंदी शुरू हुई
- राजनीतिक दल भी किसानों के बीच पहुंचकर भांपा रहे माहौल
अमर उजाला ब्यूरो
बागपत। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बिजली के दाम, गन्ने के भाव और भुगतान को लेकर किसान आंदोलन का लंबा इतिहास है। पिछले कुछ सालों में किसान सियासत बेदम रही। मगर, कृषि विधेयक के मुद्दे पर भाकियू की पहल के बाद फिर किसान सियासत गरमाने लगी है। सड़क से लेकर संसद तक विरोध हुआ। किसान संगठनों की लामबंदी तेज हुई तो अगले महीने शुरू होने जा रहे गन्ना पेराई सत्र में सरकार के सामने मुश्किलें खड़ी हो सकती है।
किसान लंबे समय तक चुप्पी साधे रहा। पिछले पेराई सत्र में इंडेंट नहीं मिला, इसके बावजूद किसान सड़क पर नहीं उतरे। गन्ना खेतों में खड़ा रहा और गेहूं की बुवाई नहीं हुई, फिर भी विरोध की गूंज नहीं दिखी। गेहूं का प्रतिपूर्ति मूल्य अब तक नहीं मिला। सब्जी किसान मुसीबत में रहे और अब धान के किसानों को मनमाफिक भाव नहीं मिल पाया है। इसके बावजूद किसान चुप्पी साधे रहे। मगर, कृषि विधेयक पर किसानों ने खामोशी तोड़ दी है। हरियाणा और पंजाब में विरोध शुरू हुआ तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाकियू ने बिगुल बजा दिया। भाकियू ने शुरूआत की तो राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन, किसान मजदूर संगठन और भाकियू के अन्य धड़े भी लामबंद हुए। चक्का जाम हुआ, जिसमें किसानों की संख्या भले ही कम रही हो, लेकिन समर्थन खूब मिला। ऐसे में अब किसान राजनीति का परिदृश्य बदलता दिख रहा है। अगले महीने से नया पेराई सत्र आरंभ होगा। कृषि विधेयक के बाद तीन नए मुद्दे किसान सियासत में फिर उठेंगे। पहला गन्ने का भाव, दूसरा चीनी मिलें समय से चलाने और तीसरा मुद्दा बकाया भुगतान। देखने वाली बात यह होगी कि कृषि विधेयक से शुरू हुआ विरोध को सरकार किस तरह देखती है।
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किसने क्या कहा?
- भाकियू जिलाध्यक्ष प्रताप गुर्जर का कहना है कि कांट्रेक्ट फार्मिंग को किसान बर्दाश्त नहीं कर सकता। सरकार कंपनियों को आगे कर अपनी जिम्मेदारी से बच रही है, यही विरोध की वजह है।
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- भारतीय किसान संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अन्नू मलिक का कहना है कि कांट्रेक्ट फार्मिंग के जरिये किसान को मजदूर बनाने की तैयारी है। कंपनियों का खेतों में दखल बढ़ जाएगा।
- भाकियू के प्रदेश उपाध्यक्ष राजेंद्र चौधरी का कहना है कि किसान सरकार की चाल समझ रहा है। कंपनियों की मनमर्जी नहीं चलने दी जाएगी। विधेयक को बर्दाश्त नहीं करेंगे।
नाराजगी तो इन मुद्दों पर भी
बागपत। किसानों का कहना है कि बकाया गन्ना मूल्य बड़ा मुद्दा है, लेकिन सरकार ध्यान नहीं दे रही है। किसान गेहूं नहीं बो सके तो धान लगाया, लेकिन अब धान के दाम नहीं मिल रहे।

सरकार वापस ले विधायक : सुरेंद्र सिंह
बागपत। देशखाप के चौधरी सुरेंद्र सिंह का कहना हे कि विधेयक को अगर किसान ही नहीं चाहते तो वापस लेने में क्या बुराई है। सरकार को यह विधेयक वापस लेना चाहिए।
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