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गन्ने की फसल में पोक्का बोईंग रोग का खतरा
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बागपत। गन्ने की फसल में पोक्का बोइंग रोग का खतरा बढ़ रहा है। इस रोग का समय पर उपचार न करने पर फसल प्रभावित हो जाती है, जिससे किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जिले में गन्नें की फसल में पोक्का बोइंग रोग का खतरा बढ़ रहा है।
जिला कृषि रक्षा अधिकारी डॉ. सूर्य प्रताप सिंह ने बताया कि पोक्का बोइंग रोग फंफूदी जनक रोग होता है, जो जून से सितंबर तक गन्ने की फसल में लगता है। फसल में रोग लगने पर पौधे की पत्तियों का रंग बदलने लगता है तथा पत्तियां नीचे की ओर मुड़ने लगती हैं। पत्तियों को देखने से ऐसा लगता है कि जैसे पत्तियों को चाकू से काट दिया हो। रोग लगने पर फसल की बढ़वार पर असर पड़ता है। जिससे फसल का उत्पादन घट जाता है और किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है।
ऐसे करे पोक्का बोइंग रोग का उपचार
बागपत। पोक्का बोइंग रोग से फसल को बचाने के लिए बीजोपचार कर फसल की बुआई करें तथा रोग ग्रस्त पौधे को उखाड़कर मिट्टी में दबा देना चाहिए। मैन्कोजैब 60 प्रतिशत व कार्बेन्डाजिम 12 प्रतिशत डब्लूपी 250 ग्राम तथा फिप्रोनील 40 प्रतिशत व इमीडाक्लोरोप्रिड 40 प्रतिशत डब्ल्यू जी 200 ग्राम का 200 लीटर पानी में घोल बनाकर स्प्रे करना चाहिए। इसके उपरांत 10 से 12 दिन के अंतराल पर कॉपरऑक्सीक्लोराइड का 500 ग्राम मात्रा का दो सौ लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ के हिसाब छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव के दौरान खेत में नमी होना जरुरी है।
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जिला कृषि रक्षा अधिकारी डॉ. सूर्य प्रताप सिंह ने बताया कि पोक्का बोइंग रोग फंफूदी जनक रोग होता है, जो जून से सितंबर तक गन्ने की फसल में लगता है। फसल में रोग लगने पर पौधे की पत्तियों का रंग बदलने लगता है तथा पत्तियां नीचे की ओर मुड़ने लगती हैं। पत्तियों को देखने से ऐसा लगता है कि जैसे पत्तियों को चाकू से काट दिया हो। रोग लगने पर फसल की बढ़वार पर असर पड़ता है। जिससे फसल का उत्पादन घट जाता है और किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है।
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ऐसे करे पोक्का बोइंग रोग का उपचार
बागपत। पोक्का बोइंग रोग से फसल को बचाने के लिए बीजोपचार कर फसल की बुआई करें तथा रोग ग्रस्त पौधे को उखाड़कर मिट्टी में दबा देना चाहिए। मैन्कोजैब 60 प्रतिशत व कार्बेन्डाजिम 12 प्रतिशत डब्लूपी 250 ग्राम तथा फिप्रोनील 40 प्रतिशत व इमीडाक्लोरोप्रिड 40 प्रतिशत डब्ल्यू जी 200 ग्राम का 200 लीटर पानी में घोल बनाकर स्प्रे करना चाहिए। इसके उपरांत 10 से 12 दिन के अंतराल पर कॉपरऑक्सीक्लोराइड का 500 ग्राम मात्रा का दो सौ लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ के हिसाब छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव के दौरान खेत में नमी होना जरुरी है।
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