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निरपुड़ा के कपिल राणा ने मछली पालन में दिखाई राह
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बागपत। निरपुड़ा गांव के युवा कपिल राणा किसानों को मछली पालन की राह दिखा रहे है। प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में मछली पालन का रकबा बढ़ा है। जलकृषि को बढ़ावा देने के लिए मछली पालन की पहल की जा रही है। हरियाणा के सिरसा में कपिल ने मछली पालन कर किसानों के लिए नई राह खोल दी है। इसके अलावा गाजियाबाद के लोनी में पचास एकड़ तालाब में मछली पालन की शुरूआत कराई है।
निरपुड़ा गांव निवासी कपिल राणा नागार्जुन विश्वविद्यालय आंध्र प्रदेश से मत्स्य विज्ञान में स्नातकोत्तर हैं। वह खुद दस एकड़ जलक्षेत्र में मछली पालन करते हैं। अपने तालाबों में रोहू, कतला, मृगल और पंगेसियस मछली का पालन कर रहे हैं। कपिल प्रदेश और अन्य राज्यों के किसानों को मछली पालन के लिए निरंतर प्रोत्साहित करते रहते हैं। कपिल बताते हैं कि मछली पालक किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान मछलियों में होने वाली बीमारियों और फिश फीड देने की सही जानकारी नहीं होने के कारण होता है। इन्हीं बातों की जानकारी और बीमारियों के बारे में तकनीकी सलाह वह देते हैं। मछली पालन में 40 प्रतिशत निवेश कर 60 प्रतिशत लाभ कमाया जा सकता है, बशर्ते कि किसान मछली पालन वैज्ञानिक तकनीक से करें। वह मुख्यत: नए किसानों को तालाब के लिए साइट सेलेक्शन, जल की जांच, फिश फीड, बीमारियों और मछली बिक्री के लिए बाजार की समस्या का समाधान करते हैं।
सीफा में प्राप्त किया प्रशिक्षण
बागपत। कपिल ने बताया कि हाल ही में उन्होंने देश की अग्रणी शोध संस्थान केंद्रीय मीठाजल जीवपालन अनुसंधान केंद्र (सीफा) में जलकृषि में स्वास्थ्य व पर्यावरण प्रबंधन विषय पर प्रशिक्षण प्राप्त किया है। प्रदेश से सात किसान, अधिकारी और इंटरप्रोन्योर ने भी प्रशिक्षण प्राप्त किया है। इस प्रशिक्षण में ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु पांडिचेरी आंध्रप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली, तेलंगाना सहित कुल बारह राज्यों के मछली पालक किसान और विभाग के अधिकारियों ने हिस्सा लिया। पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में मछली पालक किसानों को उन्नत तकनीक से अवगत कराया गया।
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ऐसे होगी आय दोगुनी
बागपत। आय दोगुनी करने के लिए सीफा में मछली की कई किस्म विकसित की गई हैं। इसमें जयंती रोहू, इंप्रूव्ड कतला शामिल हैं। इंप्रूव्ड कतला दिखने में सामान्य कतला जैसा ही लेकिन इसकी बढ़वार 17 प्रतिशत अधिक है। वहीं जयंती रोहू में रोग प्रतिरोधक क्षमता है। इन गुणों के कारण ही दोनों ही किस्म की मछलियां किसानों के लिए लाभदायी है।
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निरपुड़ा गांव निवासी कपिल राणा नागार्जुन विश्वविद्यालय आंध्र प्रदेश से मत्स्य विज्ञान में स्नातकोत्तर हैं। वह खुद दस एकड़ जलक्षेत्र में मछली पालन करते हैं। अपने तालाबों में रोहू, कतला, मृगल और पंगेसियस मछली का पालन कर रहे हैं। कपिल प्रदेश और अन्य राज्यों के किसानों को मछली पालन के लिए निरंतर प्रोत्साहित करते रहते हैं। कपिल बताते हैं कि मछली पालक किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान मछलियों में होने वाली बीमारियों और फिश फीड देने की सही जानकारी नहीं होने के कारण होता है। इन्हीं बातों की जानकारी और बीमारियों के बारे में तकनीकी सलाह वह देते हैं। मछली पालन में 40 प्रतिशत निवेश कर 60 प्रतिशत लाभ कमाया जा सकता है, बशर्ते कि किसान मछली पालन वैज्ञानिक तकनीक से करें। वह मुख्यत: नए किसानों को तालाब के लिए साइट सेलेक्शन, जल की जांच, फिश फीड, बीमारियों और मछली बिक्री के लिए बाजार की समस्या का समाधान करते हैं।
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सीफा में प्राप्त किया प्रशिक्षण
बागपत। कपिल ने बताया कि हाल ही में उन्होंने देश की अग्रणी शोध संस्थान केंद्रीय मीठाजल जीवपालन अनुसंधान केंद्र (सीफा) में जलकृषि में स्वास्थ्य व पर्यावरण प्रबंधन विषय पर प्रशिक्षण प्राप्त किया है। प्रदेश से सात किसान, अधिकारी और इंटरप्रोन्योर ने भी प्रशिक्षण प्राप्त किया है। इस प्रशिक्षण में ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु पांडिचेरी आंध्रप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली, तेलंगाना सहित कुल बारह राज्यों के मछली पालक किसान और विभाग के अधिकारियों ने हिस्सा लिया। पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में मछली पालक किसानों को उन्नत तकनीक से अवगत कराया गया।
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ऐसे होगी आय दोगुनी
बागपत। आय दोगुनी करने के लिए सीफा में मछली की कई किस्म विकसित की गई हैं। इसमें जयंती रोहू, इंप्रूव्ड कतला शामिल हैं। इंप्रूव्ड कतला दिखने में सामान्य कतला जैसा ही लेकिन इसकी बढ़वार 17 प्रतिशत अधिक है। वहीं जयंती रोहू में रोग प्रतिरोधक क्षमता है। इन गुणों के कारण ही दोनों ही किस्म की मछलियां किसानों के लिए लाभदायी है।