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Baghpat News: ऊपरी मंजिल पर पहुंचना है तो पहली मंजिल को छोड़ना पड़ेगा
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-अजितनाथ सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल जैन मुनि विशुभ्र सागर महाराज
फोटो संख्या 6
बड़ौत। मुनि विशुभ्र सागर महाराज ने कहा कि ऊपरी मंजिल पर पहुंचना है तो पहली मंजिल को छोड़ना पड़ेगा। ऐसे ही अशुद्ध को छोड़ो, शुभ में लगो, शुद्ध का पुरुषार्थ करो। शुद्ध में प्रवेश करना है तो शुभ का आश्रय लो, तो अशुभ से बच जाओगे।
वह मंगलवार को अजितनाथ सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जितना साधक सम्पर्क रखेगा, उतना ही अशांत रहेगा। जितना पर-से परिचय बढ़ेगा, उतना-उतना आप निज से दूर होते जाएंगे। अपनी शक्ति बचाना है, अपने परिणामों की विशुद्धि की रक्षा करना है, अपने संयम को सुरक्षित रखना है, अपनी यश-कीर्ति को धूमिल नहीं करना है, परम-शांति का बेदन करना है, तो पर-से दूर रहो, मौन पूर्वक साधना करो। सम्पर्क सुख क्षीण लेता है। जहां गुरुओं के तपस्वियों के, साधुओं के चरण पड़ते हैं, वहां स्वयं ही तीर्थ बन जाते हैं। कहा कि तीर्थ बनना है, तो तीर्थंकरों के पवित्र पथ पर चलो। तीर्थ वंदना के साथ परिणाम भी पवित्र करो। भावों की पवित्रता के बिना, तीर्थ वंदना भी व्यर्थ है। फूटे वर्तन में सामग्री नहीं ठहरती, ऐसे ही अशुद्ध-भावों में भगवान नहीं ठहरते हैं। पूजा करने से अच्छा पूज्य बनना है, परन्तु तब-तक पूज्य न बनो तब तक पूजा करते रहना। निजात्मा ही भगवान बनेगी, इसलिए शुद्धात्माही तीर्थ है। जैसे भगवान के कारण मंदिर की देहरी भी राज्य हो जाती है, ऐसे ही संयम धारण करने से देह भी पूज्य हो जाती है। तीर्थ तीर्थ बनने के लिए हैं, सच्चे तीर्थ नहीं हैं, जहां सत्य-अहिंसा का जयनाद होता हो। सभा में सुभाष जैन, राजकुमार जैन, महेंद्र जैन, अशोक जैन, प्रमोद जैन, वरदान जैन, हंस कुमार जैन, सुधीर जैन, अंकुर जैन, अनिल जैन, विकास जैन, जितेंद्र जैन मौजूद रहे।
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फोटो संख्या 6
बड़ौत। मुनि विशुभ्र सागर महाराज ने कहा कि ऊपरी मंजिल पर पहुंचना है तो पहली मंजिल को छोड़ना पड़ेगा। ऐसे ही अशुद्ध को छोड़ो, शुभ में लगो, शुद्ध का पुरुषार्थ करो। शुद्ध में प्रवेश करना है तो शुभ का आश्रय लो, तो अशुभ से बच जाओगे।
वह मंगलवार को अजितनाथ सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जितना साधक सम्पर्क रखेगा, उतना ही अशांत रहेगा। जितना पर-से परिचय बढ़ेगा, उतना-उतना आप निज से दूर होते जाएंगे। अपनी शक्ति बचाना है, अपने परिणामों की विशुद्धि की रक्षा करना है, अपने संयम को सुरक्षित रखना है, अपनी यश-कीर्ति को धूमिल नहीं करना है, परम-शांति का बेदन करना है, तो पर-से दूर रहो, मौन पूर्वक साधना करो। सम्पर्क सुख क्षीण लेता है। जहां गुरुओं के तपस्वियों के, साधुओं के चरण पड़ते हैं, वहां स्वयं ही तीर्थ बन जाते हैं। कहा कि तीर्थ बनना है, तो तीर्थंकरों के पवित्र पथ पर चलो। तीर्थ वंदना के साथ परिणाम भी पवित्र करो। भावों की पवित्रता के बिना, तीर्थ वंदना भी व्यर्थ है। फूटे वर्तन में सामग्री नहीं ठहरती, ऐसे ही अशुद्ध-भावों में भगवान नहीं ठहरते हैं। पूजा करने से अच्छा पूज्य बनना है, परन्तु तब-तक पूज्य न बनो तब तक पूजा करते रहना। निजात्मा ही भगवान बनेगी, इसलिए शुद्धात्माही तीर्थ है। जैसे भगवान के कारण मंदिर की देहरी भी राज्य हो जाती है, ऐसे ही संयम धारण करने से देह भी पूज्य हो जाती है। तीर्थ तीर्थ बनने के लिए हैं, सच्चे तीर्थ नहीं हैं, जहां सत्य-अहिंसा का जयनाद होता हो। सभा में सुभाष जैन, राजकुमार जैन, महेंद्र जैन, अशोक जैन, प्रमोद जैन, वरदान जैन, हंस कुमार जैन, सुधीर जैन, अंकुर जैन, अनिल जैन, विकास जैन, जितेंद्र जैन मौजूद रहे।
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