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उच्च सोच उन्नति का आधार : आचार्य विशुद्ध सागर
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फोटो संख्या 5
बड़ौत। दिगंबर जैन आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि जिसकी जैसी भविलव्यता होती है वैसी ही उसकी क्रिया होती है। आंतरिक भावों के अनुसार व्यक्ति जीवन जीता है। भावों की निर्मलता, वाणी की मधुरता, आचरण की पवित्रता, व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित बनाते हैं।
वे बुधवार को शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर कैनाल रोड पर आयोजित धर्म सभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि सोचो फिर कार्य करो। व्यक्ति की उच्च सोच ही उच्चता प्रदान करती है। जिसकी सोच पवित्र होगी, उसका भोजन भी पवित्र ही होगा। सज्जन पुरुष अपवित्र, हिंसक, मांसाहारी भोजन नहीं करते। धर्मात्मा के विचार वाणी और कार्य सर्व हितकारक होते हैं। वाणी वीना बने, बांस न बने। वाणी की मधुरता मिश्री से अधिक मीठी होती है। समता साधुता का प्रतीक होता है। नगर में साधु के आते ही आर्थिक, नैतिक, सामाजिक, मानसिक उन्नति होती है।
साधुओं के संसर्ग से भले कोई साधु न बने, लेकिन वह संतोषी अवश्य बन जाता है। संतोष परम धन है। संतोषी मानव सुख शांति को प्राप्त करता है। हम साधु बन न सकें तो कोई बात नहीं, पर संतोषी अवश्य बनें। मांसाहार मानवता पर कलंक है। कल्याणकारी दृष्टि है तो अपनी भाषा, भोजन, भाव और भेष को पवित्र करो। सुख शांति की चाह है तो अपने वचनों को संभालो। सभा का संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में विनोद जैन एडवोकेट, प्रवीण जैन, सुनील जैन, सुभाष जैन, अशोक जैन अतुल जैन उपस्थित रहे।
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बड़ौत। दिगंबर जैन आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि जिसकी जैसी भविलव्यता होती है वैसी ही उसकी क्रिया होती है। आंतरिक भावों के अनुसार व्यक्ति जीवन जीता है। भावों की निर्मलता, वाणी की मधुरता, आचरण की पवित्रता, व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित बनाते हैं।
वे बुधवार को शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर कैनाल रोड पर आयोजित धर्म सभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि सोचो फिर कार्य करो। व्यक्ति की उच्च सोच ही उच्चता प्रदान करती है। जिसकी सोच पवित्र होगी, उसका भोजन भी पवित्र ही होगा। सज्जन पुरुष अपवित्र, हिंसक, मांसाहारी भोजन नहीं करते। धर्मात्मा के विचार वाणी और कार्य सर्व हितकारक होते हैं। वाणी वीना बने, बांस न बने। वाणी की मधुरता मिश्री से अधिक मीठी होती है। समता साधुता का प्रतीक होता है। नगर में साधु के आते ही आर्थिक, नैतिक, सामाजिक, मानसिक उन्नति होती है।
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साधुओं के संसर्ग से भले कोई साधु न बने, लेकिन वह संतोषी अवश्य बन जाता है। संतोष परम धन है। संतोषी मानव सुख शांति को प्राप्त करता है। हम साधु बन न सकें तो कोई बात नहीं, पर संतोषी अवश्य बनें। मांसाहार मानवता पर कलंक है। कल्याणकारी दृष्टि है तो अपनी भाषा, भोजन, भाव और भेष को पवित्र करो। सुख शांति की चाह है तो अपने वचनों को संभालो। सभा का संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में विनोद जैन एडवोकेट, प्रवीण जैन, सुनील जैन, सुभाष जैन, अशोक जैन अतुल जैन उपस्थित रहे।
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