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रमजान में हर मुस्लिम को करना चाहिए दान : मौलाना जहीर
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संवाद न्यूज एजेंसी
अग्रवाल मंडी टटीरी। कस्बे की मस्जिद में तकरीर करते हुए मौलाना जहीर अहमद ने कहा कि रमजान माह में जरूरतमंद व्यक्तियों की मदद करनी चाहिए ताकि किसी को भूखे पेट न सोना पड़े। उन्होंने कहा कि रमजान माह में रोजे रखने की तरह जकात भी करनी चाहिए। जकात का मतलब है दान देना, अपनी आय के एक हिस्से को गरीबों में बांटने को ही जकात कहा जाता है। नमाज और रोजे की तरह जकात करना फर्ज है।
हाफिज अय्यूब ने बताया कि साढ़े 52 तोले चांदी या फिर साढ़े सात तोले सोना होना या उसके बराबर की रकम यानी पैसा जिस मुसलमान के पास है, उस पर जकात फर्ज हो जाती है। एक साल का समय बीत जाने के बाद जकात दी जाती है। हर साल जकात देना फर्ज होता है। जकात को पूरे साल में कभी भी दिया जा सकता है। मौलाना याकूब ने कहा कि जकात का सबसे पहले फर्ज रिश्तेदारी, पड़ोसी व परिवार में जो गरीब है, उसको जकात दिया जा सकता है। पड़ोस में रहने वाले निराश्रित महिलाओं को जकात दी जा सकती है। इसके अलावा मदरसे में जहां पर यतीम बच्चे पढ़ते हो, वहां पर भी जकात को दिया जा सकता है।
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अग्रवाल मंडी टटीरी। कस्बे की मस्जिद में तकरीर करते हुए मौलाना जहीर अहमद ने कहा कि रमजान माह में जरूरतमंद व्यक्तियों की मदद करनी चाहिए ताकि किसी को भूखे पेट न सोना पड़े। उन्होंने कहा कि रमजान माह में रोजे रखने की तरह जकात भी करनी चाहिए। जकात का मतलब है दान देना, अपनी आय के एक हिस्से को गरीबों में बांटने को ही जकात कहा जाता है। नमाज और रोजे की तरह जकात करना फर्ज है।
हाफिज अय्यूब ने बताया कि साढ़े 52 तोले चांदी या फिर साढ़े सात तोले सोना होना या उसके बराबर की रकम यानी पैसा जिस मुसलमान के पास है, उस पर जकात फर्ज हो जाती है। एक साल का समय बीत जाने के बाद जकात दी जाती है। हर साल जकात देना फर्ज होता है। जकात को पूरे साल में कभी भी दिया जा सकता है। मौलाना याकूब ने कहा कि जकात का सबसे पहले फर्ज रिश्तेदारी, पड़ोसी व परिवार में जो गरीब है, उसको जकात दिया जा सकता है। पड़ोस में रहने वाले निराश्रित महिलाओं को जकात दी जा सकती है। इसके अलावा मदरसे में जहां पर यतीम बच्चे पढ़ते हो, वहां पर भी जकात को दिया जा सकता है।
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