{"_id":"5a1c67564f1c1b97678be412","slug":"81511810902-baghpat-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"पंचायत तय करती थी प्रत्याशी, वोटर करते थे फैसला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पंचायत तय करती थी प्रत्याशी, वोटर करते थे फैसला
Updated Tue, 28 Nov 2017 12:58 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
छपरौली (बागपत)। निकाय चुनाव के लिए मतदान की तिथि नजदीक है। सभी प्रत्याशी वोटरों को लुभाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं। लेकिन पहले और अब के दौर में फर्क है। बुजुर्ग बताते हैं कि प्रचार का यह तरीका नहीं था लोग परिवार के आधार पर वोट करने में ज्यादा रुचि लेते थे। न कोई शोर शराबा होता था और न ही शराब बांटी जाती थी।
ओमवीर सिंह का कहना है कि पहले चुनाव में घर के मुखिया को ही प्रत्याशी कहता था और किसी से संपर्क भी नहीं करता था। परिवार के मुखिया की जो राय होती थी, पूरा परिवार उसी उसी के कहे अनुसार वोट करता था ।
सुरेंद्र सिंह ने बताया कि पहले होने वाले चुनाव में अगर गर्मी का समय है तो प्रत्याशी जिस घर में जाते थे, उन्हें शरबत पिलाया जाता था। अगर सर्दी है तो मतदाता दूध पिलाते थे। ज्यादातर दिन के समय प्रचार नहीं किया जाता था।
विज्ञापन
महेंद्र सिंह का कहना है कि पहले नगर पंचायत के चुनाव बिना ज्यादा खर्च किए होते थे। प्रत्याशी को कोई भी खर्च नहीं करने दिया जाता था। पंचायत में बैठकर यह तय किया जाता था कि वह किसे प्रत्याशी बनाए। कई लोग मना कर देते थे तो फिर दूसरे को प्रत्याशी बनाने के लिए तैयार किया जाता था ।
ओमपाल सिंह का कहना है कि ज्यादातर वोट आपसी संबंध और कुनबे के आधार पर दिए जाते थे। इसमें किसी भी तरह का कोई प्रलोभन नहीं होता था किसी से ना कोई रंजिश रखता था और ना ही कोई विवाद होता था। चुनाव के बाद इस बात को सब भूल जाते थे कि किसने किसे वोट किया है। सब मिलजुल कर रहते थे। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब पहले जैसा कुछ नहीं रहा है।
विज्ञापन
ओमवीर सिंह का कहना है कि पहले चुनाव में घर के मुखिया को ही प्रत्याशी कहता था और किसी से संपर्क भी नहीं करता था। परिवार के मुखिया की जो राय होती थी, पूरा परिवार उसी उसी के कहे अनुसार वोट करता था ।
विज्ञापन
सुरेंद्र सिंह ने बताया कि पहले होने वाले चुनाव में अगर गर्मी का समय है तो प्रत्याशी जिस घर में जाते थे, उन्हें शरबत पिलाया जाता था। अगर सर्दी है तो मतदाता दूध पिलाते थे। ज्यादातर दिन के समय प्रचार नहीं किया जाता था।
विज्ञापन
महेंद्र सिंह का कहना है कि पहले नगर पंचायत के चुनाव बिना ज्यादा खर्च किए होते थे। प्रत्याशी को कोई भी खर्च नहीं करने दिया जाता था। पंचायत में बैठकर यह तय किया जाता था कि वह किसे प्रत्याशी बनाए। कई लोग मना कर देते थे तो फिर दूसरे को प्रत्याशी बनाने के लिए तैयार किया जाता था ।
ओमपाल सिंह का कहना है कि ज्यादातर वोट आपसी संबंध और कुनबे के आधार पर दिए जाते थे। इसमें किसी भी तरह का कोई प्रलोभन नहीं होता था किसी से ना कोई रंजिश रखता था और ना ही कोई विवाद होता था। चुनाव के बाद इस बात को सब भूल जाते थे कि किसने किसे वोट किया है। सब मिलजुल कर रहते थे। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब पहले जैसा कुछ नहीं रहा है।