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व्यक्ति के भीतर ही है अशांति
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बागपत। श्री नेमिनाथ दिगंबर जैन मंदिर सरूरपुर कलां में 48 दिवसीय भक्तामर विधान में 38वें दिन ऋषि मंडल की पूजा की गई। श्रीजी का अभिषेक, शांति धारा की गई। मंडल पर 48 अर्घ्य चढ़ाए । श्रद्धालुओं ने आराधना की।
विधान निदेशक नमन जैन ने बताया कि मनुष्य कर्मों से अधिक अशांत नहीं है, वह इच्छाओं से, वासनाओं से अधिक अशांत है। जितने भी द्वंद, उपद्रव, अशांति, और सबसे ज्यादा अराजकता कहीं है, तो वह व्यक्ति के भीतर है। मनुष्य अपना संसार स्वयं बनाता है। पहले कुछ मिल जाए, इसलिए कर्म करता है और फिर बहुत कुछ मिल जाए, इसलिए कर्म करता है। इसके बाद सब कुछ मिल जाए, इसलिए कर्म करता है। उसकी यह तृष्णा कभी खत्म नहीं होती। जहां ज्यादा तृष्णा है वहां चिंता स्वाभाविक है। विधान नवीन जैन ने कराया। लक्ष्य, वैशाली, पूर्ति, मेघा, प्रज्ञा, सिम्मी, शालू, गीता, संतोष, मंजू, अनीता, सपना, जूली, उषा, सुव्रत, अदिति, हंस कुमार जैन आदि रहे।
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विधान निदेशक नमन जैन ने बताया कि मनुष्य कर्मों से अधिक अशांत नहीं है, वह इच्छाओं से, वासनाओं से अधिक अशांत है। जितने भी द्वंद, उपद्रव, अशांति, और सबसे ज्यादा अराजकता कहीं है, तो वह व्यक्ति के भीतर है। मनुष्य अपना संसार स्वयं बनाता है। पहले कुछ मिल जाए, इसलिए कर्म करता है और फिर बहुत कुछ मिल जाए, इसलिए कर्म करता है। इसके बाद सब कुछ मिल जाए, इसलिए कर्म करता है। उसकी यह तृष्णा कभी खत्म नहीं होती। जहां ज्यादा तृष्णा है वहां चिंता स्वाभाविक है। विधान नवीन जैन ने कराया। लक्ष्य, वैशाली, पूर्ति, मेघा, प्रज्ञा, सिम्मी, शालू, गीता, संतोष, मंजू, अनीता, सपना, जूली, उषा, सुव्रत, अदिति, हंस कुमार जैन आदि रहे।
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