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150 फीट में फैली तमसा नदी 30 फीट में सिमटी
ब्यूरो,अमर उजाला,आजमगढ़
Updated Thu, 22 Feb 2018 01:01 AM IST
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तमसा नदी
- फोटो : अमर उजाला
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शहर क्षेत्र की जीवनदायिनी कही जाने वाली वाली तमसा के पानी का प्रवाह थम चुका है। कभी 100 से 150 फीट की चौड़ाई में बहने वाली धारा 30 से 40 फीट तक सिमट गई है। नगर क्षेत्र से निकलने वाला गंदा पानी बिना रिसाइकल हुए ही नदी में छोड़ने से नदी प्रदूषित होती जा रही है। एक समय था जब तमसा नदी नगर की जीवनदायिनी हुआ करती थी।
बाराबंकी जनपद के रूदौली स्थित तमसा ताल से निकलकर लगभग 400 किमी की दूरी तय कर जनपद से होते हुए बलिया में जाकर गंगा में समा जाती है। इसमें जिले की लगभग 15 छोटी बड़ी नदियों का पानी भी समाहित होता था। लेकिन पर्यावरणीय बदलाव की बयार से तमसा भी अछूती नहीं रही।
एक तो बारिश कम हुई दूसरे लोगों ने इसके पानी के बहाव को कई स्थानों पर अवरुद्घ कर दिया। नदी आज भी बह रही है लेकिन एक नाले के रूप में। कभी 100 से 150 फीट की चौड़ाई में बहने वाली इसकी धारा अब 30 से 40 फीट में सिमट कर रह गई है।
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विगत कई वर्षों में नदी में बाढ़ तो दूर यह अपनी पेटी से भी बाहर नहीं आई है। कई बार तो मई और जून के महीनों में इसका पानी भी काला पड़ गया था। जिसको लेकर कई सामाजिक संगठनों ने अपनी आवाज भी बुलंद की।
विगत पांच वर्षों में नदी का पानी इसके घाटों तक भी नहीं पहुंचा है। घाट से नदी लगभग 30 से 40 फीट दूर हो गई है। एक तो गंदगी के कारण कोई इसमें स्नान नहीं करना चाहता है। लेकिन अगर कोई स्नान करने के बारे में सोचे तो उसे गंदगी के बीच से होकर नदी तक पहुंचना पड़ता है। नदी को संरक्षित करने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है वह लोग भी मौन साधे हुए हैं। अगर यही हाल रहा तो कुछ दिनों में अन्य विलुप्त नदियों की तरह इसका नाम भी दर्ज हो जाएगा।
लगभग 20 वर्ष पूर्व तक तमसा का स्वरूप ऐसा नहीं था। नदी की धारा 100 से 150 फीट की चौड़ाई में बहता था। इसमें अंबेडकर नगर के साथ ही जिले में बहने वाली लगभग 15 बरसाती नदियों का पानी आता था। हर पांच से सात वर्ष के अंतराल पर इसमें बाढ़ आती थी। लेकिन बारिश कम होने और जगह-जगह इसकी धारा को अवरूद्घ करने के कारण इसमें पानी का बहाव कम हुआ और इसकी धारा सिमट गई। - बनवारी जालान, बुद्घजीवी।
तमसा का जो वर्तमान स्वरूप है वैसा पहले कभी नहीं था। पहले देखने पर ऐसा प्रतीत होता था कि यह नदी है लेकिन आज देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई नाला बह रहा हो। इसके लिए एक तो प्रकृति दूसरे हम स्वयं जिम्मेदार हैं। क्योंकि बारिश कम होने से इसमें पानी का बहाव कम हुआ। दूसरे हम लोगों ने इसके बहाव क्षेत्र में आवास बनाकर इसे सिकुड़ने के लिए मजबूर कर दिया। - संत प्रसाद अग्रवाल, व्यापारी नेता।
यह एक बरसाती नदी है। इसका पौराणिक काल में बहुत महत्व रहा है। कई ऋषियों ने इसके किनारे पर तपस्या की थी। यह नदी कई जनपदों से होकर गुजरती है। जिसके कारण जगह जगह नाले का गंदा पानी इसमें गिरता है। जिससे होकर मिट्टी भी इसमें प्रवाहित होती है जिसने नदी की गहराई को कम कर दिया। दूसरे इसके सिल्ट की सफाई नहीं की गई। जिसके कारण नदी सिकुड़ती गई और आज इस हालत में है। - डा. सुजीत भूषण श्रीवास्तव, संयोजक तमसा बचाओ आंदोलन।
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बाराबंकी जनपद के रूदौली स्थित तमसा ताल से निकलकर लगभग 400 किमी की दूरी तय कर जनपद से होते हुए बलिया में जाकर गंगा में समा जाती है। इसमें जिले की लगभग 15 छोटी बड़ी नदियों का पानी भी समाहित होता था। लेकिन पर्यावरणीय बदलाव की बयार से तमसा भी अछूती नहीं रही।
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एक तो बारिश कम हुई दूसरे लोगों ने इसके पानी के बहाव को कई स्थानों पर अवरुद्घ कर दिया। नदी आज भी बह रही है लेकिन एक नाले के रूप में। कभी 100 से 150 फीट की चौड़ाई में बहने वाली इसकी धारा अब 30 से 40 फीट में सिमट कर रह गई है।
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विगत कई वर्षों में नदी में बाढ़ तो दूर यह अपनी पेटी से भी बाहर नहीं आई है। कई बार तो मई और जून के महीनों में इसका पानी भी काला पड़ गया था। जिसको लेकर कई सामाजिक संगठनों ने अपनी आवाज भी बुलंद की।
विगत पांच वर्षों में नदी का पानी इसके घाटों तक भी नहीं पहुंचा है। घाट से नदी लगभग 30 से 40 फीट दूर हो गई है। एक तो गंदगी के कारण कोई इसमें स्नान नहीं करना चाहता है। लेकिन अगर कोई स्नान करने के बारे में सोचे तो उसे गंदगी के बीच से होकर नदी तक पहुंचना पड़ता है। नदी को संरक्षित करने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है वह लोग भी मौन साधे हुए हैं। अगर यही हाल रहा तो कुछ दिनों में अन्य विलुप्त नदियों की तरह इसका नाम भी दर्ज हो जाएगा।
लगभग 20 वर्ष पूर्व तक तमसा का स्वरूप ऐसा नहीं था। नदी की धारा 100 से 150 फीट की चौड़ाई में बहता था। इसमें अंबेडकर नगर के साथ ही जिले में बहने वाली लगभग 15 बरसाती नदियों का पानी आता था। हर पांच से सात वर्ष के अंतराल पर इसमें बाढ़ आती थी। लेकिन बारिश कम होने और जगह-जगह इसकी धारा को अवरूद्घ करने के कारण इसमें पानी का बहाव कम हुआ और इसकी धारा सिमट गई। - बनवारी जालान, बुद्घजीवी।
तमसा का जो वर्तमान स्वरूप है वैसा पहले कभी नहीं था। पहले देखने पर ऐसा प्रतीत होता था कि यह नदी है लेकिन आज देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई नाला बह रहा हो। इसके लिए एक तो प्रकृति दूसरे हम स्वयं जिम्मेदार हैं। क्योंकि बारिश कम होने से इसमें पानी का बहाव कम हुआ। दूसरे हम लोगों ने इसके बहाव क्षेत्र में आवास बनाकर इसे सिकुड़ने के लिए मजबूर कर दिया। - संत प्रसाद अग्रवाल, व्यापारी नेता।
यह एक बरसाती नदी है। इसका पौराणिक काल में बहुत महत्व रहा है। कई ऋषियों ने इसके किनारे पर तपस्या की थी। यह नदी कई जनपदों से होकर गुजरती है। जिसके कारण जगह जगह नाले का गंदा पानी इसमें गिरता है। जिससे होकर मिट्टी भी इसमें प्रवाहित होती है जिसने नदी की गहराई को कम कर दिया। दूसरे इसके सिल्ट की सफाई नहीं की गई। जिसके कारण नदी सिकुड़ती गई और आज इस हालत में है। - डा. सुजीत भूषण श्रीवास्तव, संयोजक तमसा बचाओ आंदोलन।