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शहीदों के सपनों पर राजनीतिक अपराधीकरण पड़ा भारी
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बूढ़नपुर। जिस आजादी के सपने को लेकर शहीदों ने अग्रेजों से देश को आजाद कराया था। सही मायनों में वह आजादी आज भी कहीं नजर नहीं आती है। शहीदों के परिजनों की मानें तो राजनीतिक अपराधीकरण ने शहीदों के सपनों को कुचल दिया है। जब तक समाज में बुराइयां रहेगी तब तक शहीदों के सपनों के भारत का निर्माण नहीं हो सकता है।
आज से 70 साल पहले जब देश को आजादी मिली थी तो उम्मीद थी कि देश की सरकारें शहीदों का सपना साकार करेंगी। लेकिन आज तक कोई सरकार न तो शहीदों के सपने को पूरा कर सकी और ना ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सपने को साकार कर सकी। देश की आजादी के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाले विकास खण्ड कोयलसा के 10 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अंगद सिंह, बिसई लोहार, कृष्ण भूषण लाल, महादेव सिंह, मारकण्डेय सिंह, रामजस, राजकिशोर, बुनियादी राम, तिलकधारी सिंह, दयालविश्वकर्मा जिन्होने बाबू मारकण्डेय सिंह के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी फौज की स्थापना की थी। जिसने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए। इन दसों सेनानियों ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। बचपन से ही देश की आजादी का सपना देखने वाले पढ़ाई पूरी करते ही स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। वे लगातार क्रांतिकारियों की मदद करते थे। बाद में खुद अपनी फौज की स्थापना की। उनके साथ अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने लगे। अग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वालों में मारकण्डेय सिंह का नाम अग्रणी है। 1942 में साथियों समेत जेल भी गए थे। क्षेत्र के गिरिजेश ने बताया कि वर्ष 1942 में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ करो या मरो का नारा दिया था। हर कोई गुलामी की जंजीर को तोड़ने के लिए बेताब था। अंग्रेजों को खिलाफ संघर्ष जारी था। इसी बीच मारकण्डेय सिंह की फौज ने केशवपुर गांव में स्थित छोटी सरजू पुल को तोड़ने की जिम्मेदारी सौंपी गई। मारकण्डेय सिंह की फौज रात में पुल तोड़ने पहुंची। घना अंधेरा था। वहां मौजूद बिसई लोहार, रामजस व बुनियादी राम को लालटेन लेने के लिए गौरा भेजा गया। लेकिन वे जैसे ही बहिरादेव जंगल के पास पहुंचे थे कि रास्ते में सिपाहियों ने गिरफ्तार कर लिया। लेकिन रामजस भागने में सफल रहे। वे फौरन इसकी सूचना मारकण्डेय सिंह को दिए। जिससे मारकण्डेय सिंह की फौज पुल के नीचे छिप गई। कुछ समय बाद असलहे से भरी गाड़ी ज्यों ही पुल पार कर थी हमला बोलकर हथियारों से भरी गाड़ी को लूट लिया। इन सेनानियों का सपना देश की आजादी थी। जब देश आजाद हुआ तो वे फूले नहीं समा रहे थे।
- देश में राजनीति के अपराधीकरण ने तस्वीर बिगाड़ कर रख दी। इसके बाद कट्टरपंथ, अलगाववाद, उग्रवाद ने इस देश को और पीछे ढ़केल दिया। सही मायने में कहें तो गांधी, बोस आजाद ने आजादी को लेकर जो सपना देखा था वह आज तक पूरा नहीं हुआ। - चंद्रदेव सिंह।
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- जब तक यह बुराईयां समाप्त नहीं होती है तब तक देश सही मायनों में आजाद नहीं कहा जाएगा। ना ही शहीदों के सपनों के भारत का निर्माण ही हो सकता है। क्योंकि शहीदों ने जो सपना लेकर देश को आजाद कराया था वह आज भी पूरा नहीं हो सका है। - आनंद सिंह।
-शहीदों को लोग भूलते जा रहे हैं। शहीदों की याद में शहीद स्तम्भ तो लगा लेकिन इन शहीदों के नाम पर एक शहीद पार्क की आवश्यकता है ताकि जो भी यहां पहुंचे उन शहीदों को याद करे। उनकी कुर्बानियों को नमन करे लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई प्रयास नहीं हुआ। -जगन्नाथ सिंह।
- शहीदों को याद करने के लिए उनकी प्रतिमा या पार्क या पुस्तकालय या किसी मार्ग का नाम उनके नाम पर रखा जाना चाहिए। ताकि इन रास्तों से आने जाने वाले लोग व पुस्तकालयों में अध्ययन करने वाले लोग उन शहीदों के बारे में जानने को इच्छुक हों। - दुर्गावती सिंह।
- शहीदों के कारनामों का बखान आज से नहीं बल्कि आजादी से किया जा रहा है। लेकिन आज यह शहीद सिर्फ स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर ही याद किए जाते हैं। इसके बाद कोई इन्हें याद भी नहीं करता है। जब तक लोग उनके बलिदानों को याद नहीं रखेंगे उनके सपनों के भारत का निर्माण नहीं हो सकता। - वीरभद्र प्रताप सिंह।
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आज से 70 साल पहले जब देश को आजादी मिली थी तो उम्मीद थी कि देश की सरकारें शहीदों का सपना साकार करेंगी। लेकिन आज तक कोई सरकार न तो शहीदों के सपने को पूरा कर सकी और ना ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सपने को साकार कर सकी। देश की आजादी के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाले विकास खण्ड कोयलसा के 10 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अंगद सिंह, बिसई लोहार, कृष्ण भूषण लाल, महादेव सिंह, मारकण्डेय सिंह, रामजस, राजकिशोर, बुनियादी राम, तिलकधारी सिंह, दयालविश्वकर्मा जिन्होने बाबू मारकण्डेय सिंह के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी फौज की स्थापना की थी। जिसने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए। इन दसों सेनानियों ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। बचपन से ही देश की आजादी का सपना देखने वाले पढ़ाई पूरी करते ही स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। वे लगातार क्रांतिकारियों की मदद करते थे। बाद में खुद अपनी फौज की स्थापना की। उनके साथ अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने लगे। अग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वालों में मारकण्डेय सिंह का नाम अग्रणी है। 1942 में साथियों समेत जेल भी गए थे। क्षेत्र के गिरिजेश ने बताया कि वर्ष 1942 में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ करो या मरो का नारा दिया था। हर कोई गुलामी की जंजीर को तोड़ने के लिए बेताब था। अंग्रेजों को खिलाफ संघर्ष जारी था। इसी बीच मारकण्डेय सिंह की फौज ने केशवपुर गांव में स्थित छोटी सरजू पुल को तोड़ने की जिम्मेदारी सौंपी गई। मारकण्डेय सिंह की फौज रात में पुल तोड़ने पहुंची। घना अंधेरा था। वहां मौजूद बिसई लोहार, रामजस व बुनियादी राम को लालटेन लेने के लिए गौरा भेजा गया। लेकिन वे जैसे ही बहिरादेव जंगल के पास पहुंचे थे कि रास्ते में सिपाहियों ने गिरफ्तार कर लिया। लेकिन रामजस भागने में सफल रहे। वे फौरन इसकी सूचना मारकण्डेय सिंह को दिए। जिससे मारकण्डेय सिंह की फौज पुल के नीचे छिप गई। कुछ समय बाद असलहे से भरी गाड़ी ज्यों ही पुल पार कर थी हमला बोलकर हथियारों से भरी गाड़ी को लूट लिया। इन सेनानियों का सपना देश की आजादी थी। जब देश आजाद हुआ तो वे फूले नहीं समा रहे थे।
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- देश में राजनीति के अपराधीकरण ने तस्वीर बिगाड़ कर रख दी। इसके बाद कट्टरपंथ, अलगाववाद, उग्रवाद ने इस देश को और पीछे ढ़केल दिया। सही मायने में कहें तो गांधी, बोस आजाद ने आजादी को लेकर जो सपना देखा था वह आज तक पूरा नहीं हुआ। - चंद्रदेव सिंह।
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- जब तक यह बुराईयां समाप्त नहीं होती है तब तक देश सही मायनों में आजाद नहीं कहा जाएगा। ना ही शहीदों के सपनों के भारत का निर्माण ही हो सकता है। क्योंकि शहीदों ने जो सपना लेकर देश को आजाद कराया था वह आज भी पूरा नहीं हो सका है। - आनंद सिंह।
-शहीदों को लोग भूलते जा रहे हैं। शहीदों की याद में शहीद स्तम्भ तो लगा लेकिन इन शहीदों के नाम पर एक शहीद पार्क की आवश्यकता है ताकि जो भी यहां पहुंचे उन शहीदों को याद करे। उनकी कुर्बानियों को नमन करे लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई प्रयास नहीं हुआ। -जगन्नाथ सिंह।
- शहीदों को याद करने के लिए उनकी प्रतिमा या पार्क या पुस्तकालय या किसी मार्ग का नाम उनके नाम पर रखा जाना चाहिए। ताकि इन रास्तों से आने जाने वाले लोग व पुस्तकालयों में अध्ययन करने वाले लोग उन शहीदों के बारे में जानने को इच्छुक हों। - दुर्गावती सिंह।
- शहीदों के कारनामों का बखान आज से नहीं बल्कि आजादी से किया जा रहा है। लेकिन आज यह शहीद सिर्फ स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर ही याद किए जाते हैं। इसके बाद कोई इन्हें याद भी नहीं करता है। जब तक लोग उनके बलिदानों को याद नहीं रखेंगे उनके सपनों के भारत का निर्माण नहीं हो सकता। - वीरभद्र प्रताप सिंह।