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निवाला भी देती है तबाही मचाने वाली घाघरा
ब्यूरो, अमर उजाला, आजमगढ़
Updated Fri, 22 May 2015 12:32 AM IST
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जनपद के उत्तरी छोर से होकर बहने घाघरा नदी लगभग हर साल देवारावासियों के लिए तबाही का मंजर लेकर आती है। लिहाजा लोगों की फसलें तो बर्बाद होती ही हैं और खेत कटकर इसकी धारा में विलीन हो जाते हैं लेकिन यही घाघरा पानी हटने के बाद लोगों के जीवन निर्वाह का सहारा भी बनती है। पानी हटने के बाद खेतों में जमी रेत पर ढ़ोंढ़ नामक एक जंगली पौधा उगता है, जिसे बेचकर लोग अपने रोजी-रोटी की व्यवस्था करते हैं।
बाढ़ के दिनों में घाघरा जब रौद्र रूप में होती है तो किसानों के खेत उसकी धारा में विलीन हो जाते हैं। उनके पास पूरे वर्ष के खाने के लिए अनाज के दाने भी नहीं बचते लेकिन कहते हैं न कि ‘जिसने जन्म दिया है, वही पेट भरने का रास्ता भी देता है’। यह बात पूरी तरह से घाघरा पर सटीक बैठती है।
नदी पानी के बहाव के साथ रेत को लाकर खेतों में छोड़ देती है। इस रेती में ढोंढ़ नामक एक जंगली पौधा उगता है जो बाढ़ के समय में ही पूरी तरह से तैयार हो जाता है। जैसे ही अक्टूबर माह में बाढ़ का पानी घटता है, वैसे ही इसकी कटाई शुरू हो जाती है। किसान इसे कटवाने के लिए मजदूरों को लगाते हैं, जो एक दिन का दो सौ से लेकर ढ़ाई सौ रुपये लेते हैं। ढोंढ़ को काटने के बाद किसान एक जगह पर रखते हैं। दूर-दूर से लोग आकर इसे खरीद कर ले जाते हैं।
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ढोंढ़ के प्रयोग से बनाई गई मड़ई काफी ठंडी होती है जिसके कारण इसकी डिमांड भी बहुत होती है। ढोंढ़ का एक बोझ 25 से 30 रुपये की दर से बिकता है। गोरखपुर, मऊ, अंबेडकरनगर, फैजाबाद आदि जनपदों के लोग आकर इसे खरीदते हैं। शौकीन लोग इसके प्रयोग से अच्छी-अच्छी काटेज का निर्माण करते हैं।
वहीं मुर्गी फार्म आदि खोलने वाले भी मड़ई के लिए इसका प्रयोग करते हैं। अन्य घास फूस की बनी मड़ई की अपेक्षा ढोंढ़ की बनी मड़ई की मियाद भी ज्यादा होती है। इस जंगली घास से जहां शौकीन लोग अपना शौक और मड़ई की जरूरत को पूरा करते हैं,
वहीं इससे होने वाली आय किसानों के जीवन निर्वाह का साधन बनती है। क्षेत्र के किसान श्री निवास पटेल, सूर्यनाथ यादव, श्रीराम यादव, भजुराम सिंह पटेल, रामवृक्ष, भगवती यादव आदि का कहना है कि घाघरा की तबाही के बाद इसमें पैदा होने वाली ढोंढ़ से हमें इतनी आमदनी हो जाती है कि हम अपने दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा कर लेते हैं।
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बाढ़ के दिनों में घाघरा जब रौद्र रूप में होती है तो किसानों के खेत उसकी धारा में विलीन हो जाते हैं। उनके पास पूरे वर्ष के खाने के लिए अनाज के दाने भी नहीं बचते लेकिन कहते हैं न कि ‘जिसने जन्म दिया है, वही पेट भरने का रास्ता भी देता है’। यह बात पूरी तरह से घाघरा पर सटीक बैठती है।
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नदी पानी के बहाव के साथ रेत को लाकर खेतों में छोड़ देती है। इस रेती में ढोंढ़ नामक एक जंगली पौधा उगता है जो बाढ़ के समय में ही पूरी तरह से तैयार हो जाता है। जैसे ही अक्टूबर माह में बाढ़ का पानी घटता है, वैसे ही इसकी कटाई शुरू हो जाती है। किसान इसे कटवाने के लिए मजदूरों को लगाते हैं, जो एक दिन का दो सौ से लेकर ढ़ाई सौ रुपये लेते हैं। ढोंढ़ को काटने के बाद किसान एक जगह पर रखते हैं। दूर-दूर से लोग आकर इसे खरीद कर ले जाते हैं।
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ढोंढ़ के प्रयोग से बनाई गई मड़ई काफी ठंडी होती है जिसके कारण इसकी डिमांड भी बहुत होती है। ढोंढ़ का एक बोझ 25 से 30 रुपये की दर से बिकता है। गोरखपुर, मऊ, अंबेडकरनगर, फैजाबाद आदि जनपदों के लोग आकर इसे खरीदते हैं। शौकीन लोग इसके प्रयोग से अच्छी-अच्छी काटेज का निर्माण करते हैं।
वहीं मुर्गी फार्म आदि खोलने वाले भी मड़ई के लिए इसका प्रयोग करते हैं। अन्य घास फूस की बनी मड़ई की अपेक्षा ढोंढ़ की बनी मड़ई की मियाद भी ज्यादा होती है। इस जंगली घास से जहां शौकीन लोग अपना शौक और मड़ई की जरूरत को पूरा करते हैं,
वहीं इससे होने वाली आय किसानों के जीवन निर्वाह का साधन बनती है। क्षेत्र के किसान श्री निवास पटेल, सूर्यनाथ यादव, श्रीराम यादव, भजुराम सिंह पटेल, रामवृक्ष, भगवती यादव आदि का कहना है कि घाघरा की तबाही के बाद इसमें पैदा होने वाली ढोंढ़ से हमें इतनी आमदनी हो जाती है कि हम अपने दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा कर लेते हैं।