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पैसा हो भले कम लेकिन काम मिले बराबर तो न जाएं बाहर
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आजमगढ़। शनिवार को सूरत से प्रवासी श्रमिकों केे लेकर एक श्रमिक स्पेशल ट्रेन आजमगढ़ रेलवे स्टेशन पर पहुंची। इस ट्रेन में कुल 1699 यात्री सवार थे। पुलिस ने एक-एक बोगी को खाली कराकर स्टेशन पर ही उनकी लाइन लगवा दी। प्रवासी श्रमिकों के चेहरे को देखकर उनकी बेबसी के बीच घर पहुंचने की ललक साफ दिखाई दे रही है। ऐसे में मजदूरों से जब हमने बात की तो लगभग सभी का एक ही कहना था कि अगर यहां बराबर काम मिलता रहे तो हम घर परिवार से इतनी दूर क्या करने जाएं। दूसरे वहां हमें काम करने की मजदूरी भी यहां से 100-200 रुपये ज्यादा मिलती है। वह भी घर परिवार से दूर नहीं जाना चाहते लेकिन परिवार का भरण पोषण भी करना है। जिसके लिए उन्हें बाहर जाना पड़ता है। अगर यहीं पर कम पैसा भले ही मिले लेकिन काम बराबर मिलता रहे तो वह बाहर क्यों जाएंगे।
बोले प्रवासी श्रमिक
हम काफी दिनों से सूरत में रहते हैं। वहां पर हम स्लाइडिंग दरवाजा बनाने का कार्य करते हैं। लाक डाउन के कारण जब काम मिलना बंद हो गया तो घर आना मजबूरी हो गई। अगर हमें यहीं पर बराबर काम मिले तो हम वहां जाने के बारे में सोचें भी न।
हरेंद्र निषाद, घोसी, मऊ।
हम सूरत में रहकर फर्नीचर बनाने का काम करते थे। एक व्यक्ति हमें अपने यहां रखकर काम कराता था। जिससे बराबर काम मिलता था लेकिन यहां पर बराबर काम नहीं मिलता। जिससे परेशानी होती है। अगर पैसा भले ही कम मिलता लेकिन काम बराबर मिलता तो बाहर जाने की नौबत ही नहीं आती। राजेश, बड़हलगंज, गोरखपुर।
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हम वहां पर पेंटिंग का काम करते थे। वहां का एक व्यक्ति कांटैक्ट लेकर काम करवाता है। हम उसी के अंडर में काम करते थे। जिसके कारण कहीं न काम हमेशा चलता रहता था। लेकिन यहां पर दो दिन काम करने के बाद तीन दिन बैठना पड़ता है।
राकेश साहनी, बड़हलगंज, गोरखपुर।
हम सूरत में फर्नीचर बनाने का काम करते थे। हमारे परिवार के लोग वहां पहले से रहते हैं। इसलिए हम भी चले गए थे। काम बंद होने के कारण हमें घर आना पड़ा। अब माहौल ठीक होने के बाद ही हम वहां जाने के बारे में सोचेंगे। अगर यहीं पर काम मिलता है तो यहीं पर करेंगे।
नीलेश, बड़हलगंज, गोरखपुर।
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बोले प्रवासी श्रमिक
हम काफी दिनों से सूरत में रहते हैं। वहां पर हम स्लाइडिंग दरवाजा बनाने का कार्य करते हैं। लाक डाउन के कारण जब काम मिलना बंद हो गया तो घर आना मजबूरी हो गई। अगर हमें यहीं पर बराबर काम मिले तो हम वहां जाने के बारे में सोचें भी न।
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हरेंद्र निषाद, घोसी, मऊ।
हम सूरत में रहकर फर्नीचर बनाने का काम करते थे। एक व्यक्ति हमें अपने यहां रखकर काम कराता था। जिससे बराबर काम मिलता था लेकिन यहां पर बराबर काम नहीं मिलता। जिससे परेशानी होती है। अगर पैसा भले ही कम मिलता लेकिन काम बराबर मिलता तो बाहर जाने की नौबत ही नहीं आती। राजेश, बड़हलगंज, गोरखपुर।
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हम वहां पर पेंटिंग का काम करते थे। वहां का एक व्यक्ति कांटैक्ट लेकर काम करवाता है। हम उसी के अंडर में काम करते थे। जिसके कारण कहीं न काम हमेशा चलता रहता था। लेकिन यहां पर दो दिन काम करने के बाद तीन दिन बैठना पड़ता है।
राकेश साहनी, बड़हलगंज, गोरखपुर।
हम सूरत में फर्नीचर बनाने का काम करते थे। हमारे परिवार के लोग वहां पहले से रहते हैं। इसलिए हम भी चले गए थे। काम बंद होने के कारण हमें घर आना पड़ा। अब माहौल ठीक होने के बाद ही हम वहां जाने के बारे में सोचेंगे। अगर यहीं पर काम मिलता है तो यहीं पर करेंगे।
नीलेश, बड़हलगंज, गोरखपुर।