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अब जन्मजात टेढ़े पैरों का इलाज जिले में हुआ संभव

Fri, 03 Aug 2018 11:45 PM IST
Updated Fri, 03 Aug 2018 11:45 PM IST
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अब जन्मजात टेढ़े पैरों का इलाज जिले में हुआ संभव
आजमगढ़। जन्मजात टेढ़े-मेढ़े पैर वाले बच्चों के इलाज की सुविधा अब जिले में भी उपलब्ध हो गई है। मंडलीय अस्पताल के डॉक्टरों की टीम ने शिकंजा पद्यति से ऐसे एक बच्चे का सफल आपरेशन बुधवार को अस्पताल के ओटी में किया। मंडलीय अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा की गई इस नयी शुरूआत से अब टेढ़े-मेढ़े पैर वाले बच्चों को इलाज के लिए हॉयर सेंटर नहीं जाना पड़ेगा और मामूली खर्च पर उनका यहीं इलाज हो सकेगा।
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जीयनपुर कोतवाली क्षेत्र के बलुआ गांव निवासी अखिलेश के ढाई वर्षीय पुत्र राजा का पैर जन्म से ही ढेढ़ा-मेढ़ा था। जिसके चलते बच्चा चल नहीं पाता था। बच्चें को लेकर परिजन काफी परेशान थे और आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के चलते वे उसे इलाज के लिए हॉयर सेंटर भी नहीं ले जा पा रहे थे। इस बीच एक दिन परिजन बच्चें को लेकर मंडलीय अस्पताल के हड्डी रोग विभाग में संपर्क किया। जहां तैनात डॉक्टर वीके श्रीवास्तव और डॉ. पीबी प्रसाद ने बच्चें को देखा। दोनों डॉक्टरों ने जोशी एक्सटर्नल स्टैबिलेशन सिस्टम (शिकंजा पद्यति) से बच्चे का इलाज करने का निर्णय लिया। परिजनों से शिकंजा की व्यवस्था कराने के बाद डॉ. वीके श्रीवास्तव, डॉ. पीबी प्रसाद और डॉ. एजे उस्मानी की टीम ने बुधवार को सफल आपरेशन कर बच्चे के टेढ़े-मेढ़े पैर में शिकांजा लगा दिया। तीन माह तक यह शिकंजा लगा रहेगा और उसके पश्चात शिकंजा को निकाल कर बच्चें को चलने की प्रैक्टिस करायी जायेगी। पूर्व में जन्मजात बच्चों के इस पद्यति से इलाज की सुविधा बड़े शहरों में मौजूद थी जहां प्राइवेट अस्पतालों में एक से सवा लाख रुपये का खर्च आता था। मंडलीय अस्ताल में हुए सफल आपरेशन में परिजनों को सिर्फ शिकंजा बाजार से उपलब्ध कराना पड़ा। अन्य सुविधाएं अस्पताल से नि:शुल्क मिल गयी।
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जन्म से टेढ़े-मेढ़े पैर वाले बच्चे सीटीईवी (कानमेंटल टेलियंस इक्वीनों वायरस) से ग्रसित होते है। इसके चलते ही पैर टेढ़े-मेढ़े हो जाते है और बच्चे अपने पैरों पर चल नहीं पाते है। शिकंजा पद्यति से ऐसे पैरो को ठीक किया जा सकता है। अब तक इसकी सुविधा बड़े शहरों में ही उपलब्ध थी लेकिन अब मंडलीय अस्पताल में भी यह सुविधा उपलब्ध हो गई है। पहला आपरेशन पूरी तरह से सफल रहा है। आपरेशन का शिकंजा लगा दिया गया है, जो तीन महीने के बाद निकाल दिया जायेगा और इसके बाद बच्चें को चलने की प्रैक्टिस शुरू करा दी जायेगी। चार छह माह में बच्चा चलने लगेगा।
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डॉ. वीके श्रीवास्तव, हड्डी रोग विशेषज्ञ, मंडलीय अस्पताल, आजमगढ़।
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