सरकारी चिकित्सा प्रणाली से टूटती आस
मूल अधिकारों में शुमार बेहतर चिकित्सा के हक से जिले के लोग सरकारी अस्पतालाें की सुविधाओं से वंचित है। निजी अस्पताल का इलाज महंगा तो जरूर है, पर विशेषज्ञ चिकित्सक, उमदा किस्म की दवाइयां, पर्याप्त संसाधन और बेहतर सुविधाआें ने सरकारी चिकित्सा व्यवस्था को क्षीण कर रखा है।
अधूरे संसाधन, काबिल चिकित्सकों के रिक्त पद, अनुबंधित दवा कंपनियों के दावे से जुदा दवाइयां व सुविधा के नाम पर शून्य सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने में मरीजों की आस टूट रही है।
औरैया छोटा जनपद होने के कारण यहां सरकारी और निजी अस्पतालों में उपचार के संसाधनों में विशेष अंतर तो नहीं है। जिले में आबादी का 10 फीसदी तबका सरकारी अस्पतालों पर इलाज के लिए निर्भर है।
यह उनकी मजबूरी भी है, जबकि आबादी का बड़ा हिस्सा मौसमी बीमारियों के अलावा रोगों के उपचार के लिए निजी अस्पतालों को तरजीह देना ज्यादा उचित समझता है।
दर्जा प्राप्त जिला अस्पताल के अलावा सात सीएचसी, 25 पीएचसी व 138 संचालित स्वास्थ्य उपकेंद्र के आंकड़े भी कुछ यही प्रमाणित करते हुए नजर आ रहें हैं। सरकारी अस्पतालों में उपचार पर नजर डालें तो यहां संपूर्ण सुविधाओं युक्त जिला अस्पताल तक नहीं है।
ब्लड बैंक, बेहतर पैथोलाजी, सर्जिकल ट्रीटमेंट जैसे अति आवश्यक संसाधन भी नहीं हैं। गंभीर रोगियों के उपचार के लिए सरकारी अस्पतालों की छवि रेफरल (स्थानांतरित) केंद्र के रूप में बनती जा रही है।
पिछले वित्तीय वर्ष में 1040.31 लाख के सापेक्ष जिला योजना वर्ष 2015-16 के लिए 1404.48 लाख रुपये की भले ही वृद्धि की गई हो, लेकिन संसाधन पूरे कर लिए जाने पर भी विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के चलते सरकारी अस्पतालों की छवि में परिवर्तन आना संभव नहीं दिखाई देता है।
वहीं सरकारी अस्पतालों को मात देते हुए निजी अस्पताल मरीजों को बेहतर और बेहतर संसाधन उपलब्ध कराने के अलावा बाहर के काबिल चिकित्सकों के माध्यम से आम लोगों में अपना विश्वास और मजबूत करने में लगे हैं।
सरकारी अस्पतालों में संसाधनों के साथ ही चिकित्सकों व कर्मचारियों के बड़े पद रिक्त हैं। मैनपावर कम होने से लोगों का विश्वास डिगा है। प्रदत्त संसाधनों में हम बेहतर इलाज मुहैया कराने का प्रयासरत हैं।- डा. नरेंद्र कुमार सिंह यादव,
सीएमओ औरैया