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Auraiya News: नौ साल बाद भी प्लास्टिक सर्जरी व बर्न यूनिट का नहीं हो सका संचालन
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औरैया। नौ साल पहले तत्कालीन 100 शैया जिला अस्पताल के परिसर में प्लास्टिक सर्जरी व बर्न यूनिट बनाई गई। इसमें लाखों रुपये के उपकरण भी लगा दिए गए। नौ साल बीत जाने के बाद भी न यहां डॉक्टरों की तैनाती हो सकी और न ही स्टाफ की।
अब यह परिसर मेडिकल कॉलेज के जिम्मे है। बिल्डिंग काफी हद तक जर्जर हो गई है। बावजूद बर्न यूनिट का संचालन शुरू नहीं कराया जा सका है। आग से झुलसे मरीजों को कानपुर, लखनऊ, सैफई या आगरा रेफर किया जा रहा है।
100 शैया जिला अस्पताल में वर्ष 2015 में करीब एक करोड़ रुपये की लागत से वातानुकूलित प्लास्टिक सर्जरी व बर्न यूनिट की स्थापना की गई थी। उम्मीद जगी थी कि आग से झुलसने वाले मरीजों को यहीं इलाज मिल जाएगा। साथ ही सर्जरी भी आसानी से हो सकेगी, लेकिन डॉक्टरों और स्टाफ की तैनाती न होने से यूनिट चालू नहीं हो पाई। यूनिट पर आज भी ताला लटक रहा है।
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इमारत की देखरेख ठीक ढंग से न होने से अंदर से बाहर तक धूल और गंदगी है। यूनिट की बाहरी फर्श जगह-जगह धंस गई है। कई खिड़कियों के कांच टूट गए हैं। कमरों के अंदर रखे उपकरण पड़े-पड़े जंग खा गए हैं। यूनिट को कबूतरों ने अपना ठिकाना बना लिया है। बिल्डिंग के चारों ओर झाड़ियों उग आई हैं।
अनदेखी की मार झेल रही बर्न यूनिट की बिल्डिंग काफी हद तक जर्जर हो गई है। अब यह भवन मेडिकल कॉलेज के जिम्मे आ गया है। ऐसे में पिछले डेढ़ साल यहां मेडिकल कॉलेज प्रशासन की ओर से भी अनदेखी की जा रही है। महज शल्य चिकित्सक से लेकर एनेस्थेटिक व अन्य स्टाफ की तैनाती होने की देरी है। इस इंतजार में जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं पर ताला जड़ा है।
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वर्जन
चिकित्सक व स्टाफ की तैनाती को लेकर प्रयास किए जा रहे हैं। आवेदन मांगे गए हैं। एक बर्न यूनिट व प्लास्टिक सर्जरी अस्पताल को लेकर कम से कम चार एनेस्थेटिस्ट की तैनाती होनी चाहिए। स्टाफ की पूर्ति होते ही यूनिट को शुरू करा दिया जाएगा।
-डॉ. धर्मेंद्र कुमार, प्रभारी प्राचार्य मेडिकल कॉलेज
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अब यह परिसर मेडिकल कॉलेज के जिम्मे है। बिल्डिंग काफी हद तक जर्जर हो गई है। बावजूद बर्न यूनिट का संचालन शुरू नहीं कराया जा सका है। आग से झुलसे मरीजों को कानपुर, लखनऊ, सैफई या आगरा रेफर किया जा रहा है।
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100 शैया जिला अस्पताल में वर्ष 2015 में करीब एक करोड़ रुपये की लागत से वातानुकूलित प्लास्टिक सर्जरी व बर्न यूनिट की स्थापना की गई थी। उम्मीद जगी थी कि आग से झुलसने वाले मरीजों को यहीं इलाज मिल जाएगा। साथ ही सर्जरी भी आसानी से हो सकेगी, लेकिन डॉक्टरों और स्टाफ की तैनाती न होने से यूनिट चालू नहीं हो पाई। यूनिट पर आज भी ताला लटक रहा है।
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इमारत की देखरेख ठीक ढंग से न होने से अंदर से बाहर तक धूल और गंदगी है। यूनिट की बाहरी फर्श जगह-जगह धंस गई है। कई खिड़कियों के कांच टूट गए हैं। कमरों के अंदर रखे उपकरण पड़े-पड़े जंग खा गए हैं। यूनिट को कबूतरों ने अपना ठिकाना बना लिया है। बिल्डिंग के चारों ओर झाड़ियों उग आई हैं।
अनदेखी की मार झेल रही बर्न यूनिट की बिल्डिंग काफी हद तक जर्जर हो गई है। अब यह भवन मेडिकल कॉलेज के जिम्मे आ गया है। ऐसे में पिछले डेढ़ साल यहां मेडिकल कॉलेज प्रशासन की ओर से भी अनदेखी की जा रही है। महज शल्य चिकित्सक से लेकर एनेस्थेटिक व अन्य स्टाफ की तैनाती होने की देरी है। इस इंतजार में जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं पर ताला जड़ा है।
वर्जन
चिकित्सक व स्टाफ की तैनाती को लेकर प्रयास किए जा रहे हैं। आवेदन मांगे गए हैं। एक बर्न यूनिट व प्लास्टिक सर्जरी अस्पताल को लेकर कम से कम चार एनेस्थेटिस्ट की तैनाती होनी चाहिए। स्टाफ की पूर्ति होते ही यूनिट को शुरू करा दिया जाएगा।
-डॉ. धर्मेंद्र कुमार, प्रभारी प्राचार्य मेडिकल कॉलेज