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टेसू आए बमबम वीर, हाथ लिए सोने की तीर...
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औरैया। टेसू आए बमबम बीर, हाथ लिए सोने की तीर...मेरा टेसू यहीं अड़े, कुछ लेकर बढ़ें। इन पंक्तियों के साथ बचपन की यादों में शुमार टेसू-झांझी उत्सव अब विलुप्त होने लगी हैं। दशहरा से कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाले इस उत्सव से नए पीढ़ी के बच्चे अनजान है। महाभारत कालीन टेसू और झांझी का यह उत्सव ब्रज से लेकर बुंदेलखंड तक में खासा लोकप्रिय है।
एक दशक पहले तक शहर की गलियों में छोटे-बच्चे और बच्चियां टेसू-झेंझी लेकर घर-घर निकलते थे। गाना-गाकर चंदा मांगते थे। हर साल कोई एक परिवार झांझी के लिए घराती और दूसरा परिवार टेसू की तरफ से बराती होता था। कुछ इलाकों में शरद पूर्णिमा के दिन बड़े स्तर पर आयोजन होते थे। शोभा यात्रा भी निकलती थी। वहीं दशहरा पर रावण दहन के साथ ही बच्चे टेसू लेकर घर-घर टेसू के गीतों के साथ नेग मांगते हैं, वहीं लड़कियों की टोली घर के आसपास झांझी के साथ नेग के मांगने लिए निकलती थीं।
एक समय था जब शहर में कई स्थानों पर टेसू-झांझी का विवाह बड़े ही धूमधाम से होते थे। बच्चों के साथ बड़े भी इसमें शिरकत करते थे, लेकिन अब यह परंपरा समाप्त होने की कगार पर पहुंच रही है।
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टेसू और झांझी की परंपरा अब रस्म अदायगी तक ही सीमित होकर रह गई है। गांव-गली में अभी भी कुछ हद तक बच्चे टेसू-झांझी मांगते दिखते हैं, लेकिन शहर में यह परंपरा खत्म होती जा रही है।
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एक दशक पहले तक शहर की गलियों में छोटे-बच्चे और बच्चियां टेसू-झेंझी लेकर घर-घर निकलते थे। गाना-गाकर चंदा मांगते थे। हर साल कोई एक परिवार झांझी के लिए घराती और दूसरा परिवार टेसू की तरफ से बराती होता था। कुछ इलाकों में शरद पूर्णिमा के दिन बड़े स्तर पर आयोजन होते थे। शोभा यात्रा भी निकलती थी। वहीं दशहरा पर रावण दहन के साथ ही बच्चे टेसू लेकर घर-घर टेसू के गीतों के साथ नेग मांगते हैं, वहीं लड़कियों की टोली घर के आसपास झांझी के साथ नेग के मांगने लिए निकलती थीं।
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एक समय था जब शहर में कई स्थानों पर टेसू-झांझी का विवाह बड़े ही धूमधाम से होते थे। बच्चों के साथ बड़े भी इसमें शिरकत करते थे, लेकिन अब यह परंपरा समाप्त होने की कगार पर पहुंच रही है।
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टेसू और झांझी की परंपरा अब रस्म अदायगी तक ही सीमित होकर रह गई है। गांव-गली में अभी भी कुछ हद तक बच्चे टेसू-झांझी मांगते दिखते हैं, लेकिन शहर में यह परंपरा खत्म होती जा रही है।