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कार्तिक पूर्णिमा पर पचनद पर दिखेगा महामृत्यंजय यंत्र
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अजीतमल (औरैया)। कार्तिक पूर्णिमा पर मंगलवार को पचनद पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाएंगी। यहां यमुना, चंबल, क्वारी, सिंध, पहुंच पांच नदियों का संगम है, इसलिए इसे पंचनद कहा जाता है। औरैया, इटावा, भिंड एवं जालौन चार जिलों के मध्य में स्थित पचनद पर दूर-दूर से लोग स्नान करने आते हैं।
पुराणों में पचनद क्षेत्र को सुदर्शन तीर्थ कहा गया है, जहां पचनद के जल में खड़े होकर भगवान विष्णु ने आदि शक्ति माहेश्वरी को प्रसन्न कर सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था। जनश्रुति है कि द्वापर युग में पांडवों ने यहां अज्ञातवास की अवधि बिताई थी। पूजा के लिए महारानी द्रोपदी के लिए भगवान ओमकारेश्वर एवं महाकालेश्वर के दो शिवलिंग पचनद में स्थापित किए। आज भी मानता है कि कुंवारी कन्या कार्तिक माह में पचनद के जल में स्नान करके इन शिवलिंग पर जलाभिषेक करती है तो उन्हें मन वांछित वर प्राप्त होता है।
एक कथा यह भी है कि दानवराज दनू के पुत्रों रम्य व करम्य ने ब्रह्मा जी के कहने पर पचनद में तपस्या की। करम्य ने पचनद के जल में एक पैर पर खड़े होकर तपस्या की तो रम्य आम की लकड़ी जलाकर उसके मध्य बैठकर तपस्या की। तब इंद्र ने मगर के रूप में कर्म का पैर पकड़कर गहरे कूप में ले जाकर उसका वध कर दिया। तब रम्य ने दुखी होकर आग में जलने का प्रयास किया। इस पर ब्रह्मा जी ने दर्शन देकर वर मांगने को कहा तो पहले वर में अपने भाई की अकाल मृत्यु से मुक्ति के लिए प्रार्थना की, तब ब्रह्माजी ने अपने कमंडल का जल को संगम में डाल दिया। इसके प्रभाव से आज भी कार्तिक पूर्णिमा में सूर्योदय एवं सूर्यास्त पर जल में डुबकी लगाने पर चारों ओर महामृत्युंजय यंत्र दिखाई देता है। जिसके प्रभाव से अकाल मृत्यु नहीं होती।
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पुराणों में पचनद क्षेत्र को सुदर्शन तीर्थ कहा गया है, जहां पचनद के जल में खड़े होकर भगवान विष्णु ने आदि शक्ति माहेश्वरी को प्रसन्न कर सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था। जनश्रुति है कि द्वापर युग में पांडवों ने यहां अज्ञातवास की अवधि बिताई थी। पूजा के लिए महारानी द्रोपदी के लिए भगवान ओमकारेश्वर एवं महाकालेश्वर के दो शिवलिंग पचनद में स्थापित किए। आज भी मानता है कि कुंवारी कन्या कार्तिक माह में पचनद के जल में स्नान करके इन शिवलिंग पर जलाभिषेक करती है तो उन्हें मन वांछित वर प्राप्त होता है।
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एक कथा यह भी है कि दानवराज दनू के पुत्रों रम्य व करम्य ने ब्रह्मा जी के कहने पर पचनद में तपस्या की। करम्य ने पचनद के जल में एक पैर पर खड़े होकर तपस्या की तो रम्य आम की लकड़ी जलाकर उसके मध्य बैठकर तपस्या की। तब इंद्र ने मगर के रूप में कर्म का पैर पकड़कर गहरे कूप में ले जाकर उसका वध कर दिया। तब रम्य ने दुखी होकर आग में जलने का प्रयास किया। इस पर ब्रह्मा जी ने दर्शन देकर वर मांगने को कहा तो पहले वर में अपने भाई की अकाल मृत्यु से मुक्ति के लिए प्रार्थना की, तब ब्रह्माजी ने अपने कमंडल का जल को संगम में डाल दिया। इसके प्रभाव से आज भी कार्तिक पूर्णिमा में सूर्योदय एवं सूर्यास्त पर जल में डुबकी लगाने पर चारों ओर महामृत्युंजय यंत्र दिखाई देता है। जिसके प्रभाव से अकाल मृत्यु नहीं होती।
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